शिवाजी महाराज की विजय गाथा | Shivaji Maharaj ka Jivan Charitra


शिवाजी महाराज एक कुशल शूरवीर एवं सफल कूटनीतिज्ञ थे।  अपने शत्रु  को कभी एक नही होने दिया। उनकी सैन्य प्रतिभा ने औरंजेब जैसे शक्तिशाली शासक को सोचने के लिए मजबूर कर दिया था। अफजल खा की हत्या, शाहिस्ते खा पर सफल हमला और औरंजेब के गढ़ से छुपकर भाग आना उनकी ऐसी प्रतिभा और विलक्षण बुद्धिका परिचायक रहा है।

Veer shivaji

वीर योद्धा शिवाजी राजे  का जन्म

शके १५५१ फाल्गुन वद्य तृतीयेस याने १९ फरवरी १६३० माता जीजाबाई को जुन्नर के पास ''शिवनेरी'' इस  दुर्ग पर शिवाजी महाराज का जन्म हुवा उन्होंने देवी शिवाई से मन्नत माँगी थी।  उन्हें एक बलशाली पुत्र की प्राप्ति हो इसलिए इस पुत्र का नाम '' शिवाजी '' रखा गया। शिवाजी महाराज के पिताजी शहाजीराजे भोसले दक्षिण के मातब्बर सरदार थे। अहमदनगर  निजामशाही केँ एक केंद्र बिंदु थे। सन १६३२ में मुघलों ने निजामशाही को जितने की तैयारियां करने लगे।  सन १६३६ में निजामशाही की हार हुई और निजामशाही ख़त्म हुई।

उसके बाद में शहाजीराजे आदिलशाही के सरदार हुए। आदिलशहाने  पुणे, सुपे, चाकन, इंदापुर, इत्यादि विभाग की जबाबदादरी शहाजीराजा को दी गई।  शहाजीराजे को आदिलशहाने कर्नाटक को कामगिरी बजाने के लिए भेजे। सन १६४१ को शहाजीराजा  ने पुणे के जहाँगीर का कारभार शिवाजीराजे और माता जीजाबाई की और जबाबदारी दी।  उनके साथ में दादाजी कोंडदेव यह अनुभवी और स्वामीनिष्ठ कारभारी था। दादाजी कोंणदेव ने पुणे के जहाँगीर में शांतता और सुव्यवस्था निर्माण किया।

माता जीजाबाई ने शिवाजीराजे को बालपन से ही स्वतंत्र और सदाचार के संस्कार दिए। स्वराज्य स्थापन के कार्य को सतत प्रयास किया गया। न्यायनिवडा और प्राथमिक शिक्षा शिवाजीराजे को दादाजी कोंणदेव के तरफ से मिली।


शिवाजी का बालपन 

शाहजीराजे और माता जीजाबाई पूजाअर्चना में लगे रहते थे। उस धार्मिक परिवार का सदस्य शिवाजी थे। इस धार्मिक माहौल का गहरा असर शिवाजी पर पड़ा। शिवाजी अपने माता के प्रति बहुत समर्पित थे। माता जीजाबाई के समक्ष वीर शिवाजी को शिक्षा और दीक्षा दी गई।  शिवाजी महाराज के पिताजी शहाजीराजे भोसले विजापुर के राजा सुल्तान के मराठा सैना अध्यक्ष थे। शिवाजीराजे छोटे थे तबी उनको पुणे मे रहने का अवसर प्राप्त हुवा। पुणे मे शिवाजीराजे की देखभाल की जिम्मेदारी शहाजीराजे ने दादोजी कोंणदेव को सौंपी। शिवाजी को कम उम्र में घुड़सवार, तिरंदाजी और निशानेबाजी के गुण पढाये गए।


शिवाजीराजे की जबाबदारी 

जहागिरी का कारभार सभालते समय अपने प्रजा पर कोई अन्याय नही होना चाहिए, जहाँगीर की प्रजा किसानी करनेवाले थे।  इसलिए महाराज ने खेती को बहुत ही ज्यादा प्राधान्य दिए। किसानों के उपर जुल्म- जबरदस्ती करनेवाले वतनदारों को दंडित किये। वतनदार के बेजबाबदार और मनमानी के कारभार के कारण  प्रजा त्रस्त थी। शिवाजीराजे का कारभार लोकाभिमुख था। इस कारण शिवाजीमहाराज के प्रति जनता के मन में विश्वास और अपनेपन की भावना प्रगट हुई। दादाजी नरसप्रभु, येसाजी कंक, तानाजी मालुसरे, सूर्याजी मालुसरे,जीवा महाला, बाजी पासलकर इत्यादि सहकारी शिवाजी महारज के साथ में थे। प्रजा का विश्वास और सहकार्य के बल पे शिवाजी महाराज ने स्वराज्य स्थापना की जबाबदारी लिए।





स्वराज्य स्थापना 

शिवाजी महाराज ने स्वराज्य स्थापना की सुरवात मावड़ प्रांत से किए। मावड़ का प्रदेश डोंगराड़ दरिखोरी और दुर्गम था। मावड़ के भौगोलिक परिस्थिति का फायदा महाराज ने स्वराज्य स्थापना के लिए किए।

स्वराज्य स्थापना का ध्येय, उद्देश मुद्रा में स्पस्ट किया गया है। कागजपत्र पर शिक्कामोर्तब करने का शिक्का।महाराज के मुद्रा पर संस्कृत पंग्तिया लिखे गए है,

प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुविश्ववंदिता।।
शाहसूनो : शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।।



इस पंग्तियों का अर्थ है - शहाजी का लड़का शिवाजी इनके प्रतिपद के चंद्र के कोर के जैसा कोमल राज्य लोगों के कल्याण के लिए है।
⅄|||शिवाजी महाराज के जहागिरीतील किल्ले आदिलशा के कब्जे में थे। किल्ला अपने कब्जे में हैं तो आजुबाजु के प्रदेश पर नियंत्रण रहता है। इसलिए शिवाजी महाराज ने जहाँगीर के किल्ले अपने कब्जे में लेने के लिए प्रयास करने लगे। साम-दाम-दंड-भेद इस नितिका अवलंब कर के मुरंबदेव, तोरना, कोंढाणा, पुरंदर इत्यादि किल्ले को अपने कब्जे में कर के स्वराज्य की निव स्थापन करने को प्रयत्न चालू किये। मुरंबदेव किल्ले का नाम राजगढ़ रखे।

स्वराज्यनिर्मिति के कार्य को महाराष्ट्र के आदिलशाही वतनदार -जहागिरदार ने विरोध किए। आदिलशहा ने दिए हुए वतने, हक्क वतन दारो को स्वराज्य से अधिक प्रिय थे। शिवाजी महाराज को विरोध करने वाले जावड़ी के मोरे, सुप्या के  मोहिते, मुधोंड के घोरपड़े, वाडी के सावंत इत्यादि सरदार का समावेश था।


शिवाजी हिंदू धर्म के रक्षक रूप में  उतरे और मुग़ल शासक के विरुद्ध उन्होंने युद्ध की घोषणा कर दी। उन्होंने मावल प्रदेश के युवकों में देशप्रेम की भावना का संचार कर कुशल तथा वीर सैनिकों का एक दल बनाया। शिवाजी अपने वीर तथा देशभक्त सैनिकों के सहयोग से जावली,रोहिंगा,जुन्नर, कोंकन,कल्याणी आदि प्रदेश पर अधिकार स्थापित करने में कामयाब रहे। प्रताबगढ़ तथा रायगढ़ को  मराठा राज्य की राजधानी बनाया था। शिवाजी के पिताजी शहाजीराजे ने दो हजार सैनिक छोड़ गया था। बहुत ही कम समय में शिवाजी ने अपने नेतृत्व के बलबूतेपर इस संख्या को दस हजार के पर ले गए थे। छत्रपति शिवाजी महाराज भोसले घराने के थे। उनके राज में देश के सैना में युवकों को स्थान दिए जाने को प्रभुत्व मिला था।

हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक शिवाजी महाराज ने ''गनिमी कावा  '' नामक एक लड़कों की सैना तयार की गई। इसी प्रकार लड़कों की सैना को तेजी से छुपकर आक्रमक और दुश्मन को आश्चर्य  चकित करने की कला सिखलाई थी। शिवजी माहाराज  ने जहाँगीर के किल्ले आदिलशा के कब्जे में थे। किले के माध्यम से अपने प्रदेश की रक्षा करते आती है इसलिए जहाँगीर के किले अपने कब्जे में लेने की तयारिया करने लगे।

सतारा जिल्हे के वायव्ये में जावडी नाम की बस्ती थी वहा के चन्द्रराव मोरे का शिवाजी महाराज को स्वराज्य विस्तार के लिए विरोध था इ.स १६५६ में महाराज ने लढाई करके जावडी को अपने कब्जे में किये।

जावडी के जित के बाद आदिलशा के कब्जे में से कोकण किनारपट्टी,कल्याण और भिवंडी को अपने कब्जे में लिए। इस जित के बाद शिवाजीमहाराज को हार ने के लिए अफजलखान को सरदार बनाया गया। इ स १६५९ में अफजलखान स्वराज पर चलके आया और शिवाजीमहाराज ने धैर्य से काम किया और अफजलखान का वध किया।

जय भवानी ! जय शिवजी ! हर हर माहादेव !  

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