संत ज्ञानेश्वर का जीवन चरित्र



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दोस्तों नमस्ते इस पोस्ट में हम आपको संत ज्ञानेश्वर के बारे में जानकारी देने जा रहे है ,संत ज्ञानेश्वर लगभग सात सौ साल पहले मतलब इ.सा १३ वे दशक के गीता के तत्वज्ञान मराठी में लाकर सभी को उपलब्ध करवाने वाले ज्ञानेश्वर को न जानने वाला मराठी व्यक्ती अनोखाही होगा। ज्ञानेश्वर का चरित्र सभी को पता ही है। उनको समाज ने अपमानीत किया  भिर भी उन्होंने समाज को '' ज्ञान का अमृत '' पिलाया। समाज के प्रति उनके मन में कटुता नहीं थी काव्य और तत्वज्ञान का अमृत '' भावार्थदीपिका ''किंवा ''ज्ञानेश्वरी '' इस  ग्रंथ के माध्यम से  समाज को जागृत किया। ज्ञानेश्वरी को ही भावार्थदीपिका कहा जाता है।

संत ज्ञानेश्वर का जन्म



पैठण के पास गोदावरी नदी के किनारे '' आपेगाव '' में इ.सा 1275 ( शके 1197 ) में हुवा है। पिताजी का नाम ''विठ्ठलपंथ'' और माताजी का नाम '' रुख्मिणीबाई '' था। उनके घराने में आपेगाव के कुलकर्णी थे। उनके पुर्वोजोकि यादि कुछ इस प्रकार है ---


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       विठलपंथ का विवाह आळंदी के सिधोपंथ कुलकर्णी की लड़की रुख्मिणीबाई के साथ हुआ है। विठ्ठलपंत उदासीन वृत्ति के थे उन्हों ने श्रीपादस्वामी की और से सन्यास की दीक्षा ली थी।एक दिन रुख्मिणीबाई के साथ उनके गुरु श्रीपादस्वामी से मुलाखत हुई तभी उनको पता चला की विठलपंथ विवाहित है।विठलपंथ को पुनश्च गृहस्थाश्रम स्वीकारने का आदेश उनके गुरु ने दिया। गरु के आज्ञा का पालन किए। लेकिन समाज से उन्हें और उनके बच्चो को अपमानित होना पढ़ता था।   

विठ्ठलपंत और रुख्मिणीबाई (पुत्ररत्न प्राप्ति)

1) निवृत्तिनाथ ( शके 1195 ), 2) ज्ञानेश्वर (शके 1197), 3) सोपानदेव ( शके 1199), 4) मुक्तबाई (शके 1201 ) 


विठलपंथ का प्रायश्चित 

विठलपंथ ने सन्यास लेने के बाद पुनः गृहस्थ जीवन का  स्वीकार किया लेकिन समाज ने उन्हें समाज से अलग कर दिया लड़को के उपनयन संस्कार के लिए आळंदी के ब्रह्मवृद्ध से समायाचना की लेकिन उन्होंने विठ्ठलपंत को '' देह त्याग '' का प्रायश्चित करने का आदेश दिया गया। आदेश देने के बाद विठलपंथ और रुख्मिणीबाई ने '' प्रयाग  के संगम '' में अपना देह अर्पण किया।  




माता-पिता के देह त्याग के बाद ब्रह्मण वर्ग हमे प्राश्चित का शुद्धिपत्र देंगे इस इसलिए चारो लड़के पैठण को आए लेकिन सन्यासी के लड़के है उनको कुछ अधिकार नहीं मिलेंगा,पैठण के पंडितों ने उन्हें शुद्धिपत्र नहीं दिया लेकिन उनके ऊपर का बहिष्कार निकाल देना चाहिए और चारो लोगों ने  ब्रह्मचर्य का पालन करके  हरिनाम का जप करके अपने जन्म का सार्थक करना चाहिए ऐसा पंडितों ने कहा ज्ञानेश्वर का चमत्कार देख के उन्हें '' शुद्धिपत्र '' दिया गया। 

पैठण से वापस आते समय चारो लोग नेवासा चले गए। ज्ञानेश्वर ने निवृत्तिनाथ को गुरु बनाया। निवृत्तिनाथ ने त्र्यंबकेश्वर में गहिनीनाथ से नागपंथी साधु से ज्ञान की दीक्षा लिई थी। ज्ञानेश्वर ने मोहिनीराजा के सभामंडप में बैठ के '' भावार्थदीपिका '' ग्रंथ लिखा। 

ज्ञानेश्वर को अपने जीवन में बहुत ही अपमानित होना पढ़ा लेकिन उन्होंने अपने अपमान का उल्लेख अपने ''ज्ञानेश्वरी'' ग्रंथ में नहीं किया है। एक दिन समाज ने ज्ञानेश्वर को समाज से अलग किया था लेकिन अपने प्रतिभाबल से समाज को अपना बना लिया। नामदेव के संतमेला के साथ तीर्थयात्रा का आनंद लिए। भागवत धर्म का प्रसार किया और ज्ञान का अमृत पिलाया। 
  
संत ज्ञानेश्वर के कार्य 

चातुर्वर्ण्य, कर्मकांड ,मंत्रतंत्र इन का पगडा समाज समाज से दूर किया। जातिसंस्था और विषमता में रहने वाले मानव समाज को आध्यात्मि समता का मार्ग दिखाया।गीता का भावार्थ बता के समाज को जागृत किया। अपना प्रपंच करते हुए भक्ति कर सकते हो ऐसा साधा मार्ग समाज को दिखाया। भक्ति के क्षेत्र में जात ,धर्म।,पंथ का भेद नहीं है। सभी एक है  

संत ज्ञानेश्वर ने उम्र के 22 वे साल ( शके 1218 ) में '' संजीवन समाधी '' लिया।       


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