डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम कैसे किए '' रोटो '' का निर्माण ?/ How did Dr.A.P.J.Abdul kalam create '' Roto '' ?


DR.APJ ABDUL KALAM

डॉ विक्रम साराभाई ने अब्दुल कलाम को दिल्ली के हॉटेल '' अशोका '' में रात के 3.30 मि.तीन बजकर तिस मिनट पर मिलने को बताया। वहा पर अब्दुल कलाम की मुलाखत हवाईदल के प्रमुख अधिकारी ग्रुप कॅप्टन व्ही .एस नारायण से हुई।डॉ.विक्रम साराभाई ने कॉफी बुलाई और कॉफी पीते-पीते अपनी योनजा दोनों को बताने लगे'' एरोप्लेन को लम्बे मार्ग की जरुरत रहती है। लेकिन पर्वतीय भागों में लढाऊ विमान को उड़ान लेना कठिन है। इसलिए ऐसे विमान टेक ऑफ करते समय विशिष्ट वेग जल्द से जल्द  पार करने को रॉकेट की सहाय्यता लिए तो पर्वतीय भागों में  कम लम्बे मार्ग पर युद्ध के विमान उड़ाना अच्छा रहेगा। इस तर से रॉकेट असिस्टेड टेक ऑफ़ सिस्टिम ( रोटो ) का विकास आप दोनों को करना है। इतना कहकर कॉफी ख़त्म हुई। दोनों को डॉ.विक्रम साराभाई ने अपने फोरव्हीलर में बैठाकर '' तिलपत रेंज '' इस पर्वतीय भाग में लेके गए।



डॉ.विक्रम साराभाई में सुबह के समय में दोनों को रशियन बनावट रोटो इंजिन दिखाया और उन्हें पूछा गया की ,'' लढाऊ विमान के लिए जल्द से जल्द टेक ऑफ़ करने के लिए लगने वाली रशियन मोटर मैने लाके दिया तो 18 महीने में रोटो की यंत्रणा बना सकते हो ?

डॉ अब्दुल कलाम और नारायण दोनों ने कहा सर करेंगे।इस बात से डॉ.विक्रम साराभाई बहुत खुश हुए। और शाम में रेडिओ पर खबर आई की '' भारत ने छोटे मार्ग पर युद्ध विमान उड़ाने का तंत्रज्ञान विकसित करने के प्रकल्प की जबाबदारी दोनो पर है और इस के प्रमुख डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम है। रोटो मोटार बनाने की जबाबदारी कलाम और नारायण ने ली और काम पर लग गए। उसी तरह दूसरी एक जबाबदारी उनपर सोपि गई सरंक्षण खाते में क्षेपणास्त्र बनाने के लिए एक समिति स्थापन कि है जिसके प्रमुख थे डॉ अब्दुल कलाम।रोटो और क्षेपणास्त्र बनाने के काम की जबाबदारी नाराणय और अब्दुल कलाम पर आने से दोनों गुरु और शिष्य की तरह काम करने लगे। अब्दुल कलाम नारायण को रॉकेट के बारे में जानकारी बताते थे और नारायण अब्दुल को युद्धसामग्री के बारे में जानकारी बताते थे।


इस तरह से रोटो और क्षेपणास्त्र के काम  करने लगे काम करते समय अगर कोई समस्या आती थी तो डॉ.विक्रम साराभाई को बताके हल करते थे। समय के पहले प्रकल्प का काम पूरा करके डॉ.विक्रम साराभाई को बताना था और उनका आशीर्वाद लेना था।

क्षेपणास्त्र के दो प्रकार है, पहिला जी क्षेपणास्त्र  यह  हजारो किलोमीटर अंतर् पार करके दुश्मन के शहर, कारखाने  और महत्व के ठिकान पर हमला कर सकता है , उसे ''स्ट्रेटेजिक'' क्षेपणास्त्र कहते है। जी क्षेपणास्त्र युद्धभूमि,शास्त्रनिर्मित कारखाने पर हमला कर सकता  है उसे ''टेक्टिकल'' क्षेपणास्त्र कहते है।

डॉ. विक्रम साराभाई को अवकाश संशोधन और अवकाश तंत्रज्ञान में अपने देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति दिख रही थी। लेकिन उसके साथ साथ सरंक्षण क्षेत्र में स्वावलंबन समर्थ और स्वयपूर्ण बनाने का मार्ग  भी दिख रहा था। इसलिय उन्होंने गुणवान और तज्ज्ञ आदमी खोज के अपने पास में रखे है।

सन 1968-69 में श्रीहरिकोटा बेट पर  उपग्रह छोड़ने का केंद्र स्थापन किया गया है।

इन्कोस्पार की पुनर्रचना कर के '' इंडियन सायन्स अकैडमी ( इन्सा ) स्थापन किया।

अणुशक्ति खाते के लिए '' इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनायझेशन (इस्त्रो) की स्थापना की। ''इस्त्रो'' के प्रमुख डॉ अब्दुल कलाम जी थे।

भारतीय बनावट उपग्रह अवतरण वाहन ( सॅटेलाईट लॉन्च व्हेइकल (एस.एल.व्ही ) बनाने के लिए अब्दुल कलाम जी ने अपनी टीम तयार की और एस.एल.व्ही -3 उपग्रह प्रक्षेपण वाहन चार विभाग में बनाना है इसलिए अपने टीम के तज्ज्ञ साथियों को काम पर लगा दिया। प्रथम विभाग में इंधन की आपूर्ति करना इसकी जबाबदारी डॉ.वसंत गोवारिकर के तरफ दि गई। दूसरा और तीसरे विभाग की जबाबदारी श्री.एम.आर.कुरूप और डॉ.ए.ई. मुथुनायगम इनके और दि गई। चौथे विभाग की जबाबदारी डॉ.ए.पि.जे.अब्दुल कलाम की  और सोपी गई। इस तरह से भारत का दस साल ( 10 साल ) का '' अवकाश संशोधन कार्यक्रम '' जाहिर हुवा।   


इस प्रकल्प को देखने के लिए फ़्रांस के विश्व विख्यात शास्त्रज्ञ '' क्युरेन '' इन्होंने प्रकल्प को व्हिजिट किए। कुछ सलाह दि और फ़्रांस सरकार का '' डायमॉट'' प्रकल्प चार विभाग में तयार किया गया। इसकी जबाबदारी डॉ. अब्दुल कलम , डॉ.वसंत गोवारिकर, श्री.एम.आर.कुरूप,डॉ.ए.ई मुठुनायगम इनके टीमों ने दो साल में पूरा किया
और कुछ कारन यह प्रकल्प रद्द किया गया। डॉ.अब्दुल कलाम और उनके टीम के साथी नाराज हुए क्यों की दो साल की मेहनत बेकार में गई। डॉ.अब्दुल कलाम जी को सबसे पहले देहरादून में पायलट के लिए उन्हें लिया नही गया था इस लिए कलाम जी नाराज थे दूसरी बात ''नंदी '' हावर क्राप्ट के काम में अपयश तसरी बात '' डायमॉट'' प्रकल्प में अपयश, लेकिन अब्दुल कलाम जी पीछे नही हटे दोस्तों पहली बार पायलट नही बन सके लेकिन प्रयास करते रहे आज वे मिसाईल मैन के नाम से जाने जाते है दोस्तों ठीक इसी तरह हम खेती करते है, नेटवर्किन मार्केटिंग हो, या हमारी पढाई हो हम जो काम करते है यह काम डॉ ए पि जे अब्दुल कलाम जी काम करने में मेहनत करते थे ठीक इसी तरह हमने मेहनत की तो हमारा जो सपना है,उसे हम पूरा कर सकते है   लगातर लगन से करना चाहिए।

'' रोटो '' का काम चालू था। रोटो के काम में अब्दुल कलाम और उसके सहकारी काम में लग गए सभी को डॉ.विक्रम साराभाई की प्रेरणा हमेशा मिलती है। दो साल बेकार गए लेकिन उन्हें एस.एल.व्ही-3 यह प्रकल्प पूरा कर के अपने गुरु डॉ.विक्रम साराभाई का आशीर्वाद लेना था, काम पूरा करके दिखाना था इसलिय दिन रात काम करने लगे।

डॉ.अब्दुल कलाम बिच बिच में काम की समीक्षा लेते थे। इसलिए प्रकल्प का काम तेजी से होने लगा। युरोप में इस काम को तिन(3 ) साल लगते है, लेकिन अब्दुल कलाम के टीम ने यह काम एक (1) साल में पूरा करके दिखाया।

प्रकल्प का काम पूरा होने की जानकारी सुनते ही डॉ.विक्रम साराभाई बहुत खुश हुए। 



डॉ.विक्रम साराभाई की थुंबा की व्हिजिट ३० दिसंबर १९७१ को थी। उसके एक दिन पहले रात में कोवलमला पैलेश में रूखे उन्हें मिलने को डॉ.वसंत गोवारिकर और उसके साथीदार उन्हें मिलने को गए। रात के 11.३० मी तक चर्चा चली। उस समय डॉ. विक्रम साराभाई के चहेते शिष्य दिल्ली के '' मिसाईल पैनल मीटिग को गए थे। दिल्ली के मीटिग की जानकारी देने के लिए अब्दुल कलाम एरोप्लेन से द्रिवेंद्रम गए। डॉ विक्रम साराभाई को फोन से अब्दुल कलाम ने मिसाईल पैनल मीटिंग के बारे में कुछ बाते बताया। फोन से बात करते हुए अब्दुल कलाम को त्रिवेंद्रम के एअरपोर्ट पर रुखने को कहा,क्यों की डॉ विक्रम साराभाई कोवलम से एरोप्लेन से अब्दुल कलाम को मिलने को आनेवाले थे। वहा से मुबई जानेवाले थे।

डॉ अब्दुल कलाम मन के मन में सोच रहे थे की अपने गुरु के साथ क्या बोलू , चर्चा क्या करू.........

दोस्तों कुछ समय बाद एरोप्लेन एरपोर्ट पर आया एरोप्लेन की सीडी लगनेवाले अधिकारी जिसका नाम था कुटी  इसने बताया की डॉ विक्रम साराभाई का अटैक से निधन हो गया है। यह सुनकर अब्दुल कलाम जमीन पर बैठ गए और रोने लगे और कहने लगे सर कितने जल्दी हमें छोड़कर चले गए , तुम्हारा आशीर्वाद ,शाबासकि की थाप लेने के लिए हम आपका इंतजार कर रहे थे सर और आप हमें हमेशा हमेशा के लिए चले गए चले गए।........  .......

डॉ. विक्रम साराभाई और अब्दुल कलाम जी की गुरु और शिष्य की जोड़ी थी। लेकिन गुरु जाने के बाद शिष्य अधूरा काम पूरा करते है। डॉ. विक्रम साराभाई ने  '' रॉकेट असिस्टेड टेक ऑफ सिस्टिम '' ( रोटो ) प्रकल्प की जबाबदारी अब्दुल कलाम पर थी,प्रकल्प पूरा होगया था उसकी चाचणी बाकि थी इस बात पर अब्दुल कलाम और नारायण जी को पछतावा हो रहा था।

इस लेख से हमें यह सिख मिलती है, की सबसे बलवान वक्त,समय है समय पर ही अब्दुल कलाम प्रकल्प का काम पूरा करते थे। लेकिन फ़्रांस का '' डायमॉट'' प्रकल्प रद्द हुवा। वाह पर दो साल की मेहनत बेकार गई। दोस्तों यही दो सालो के अंदर डॉ विक्रम साराभाई के सामने प्रकल्प की चाचणी होती और डॉ अब्दुल कलाम , नारायण उनके टीम के साथियों को पछतावा नहीं होता ठीक इसी तरह कोई बिजनस करता है, कोई खेती करता है,  दोस्तों  समय पर पढ़ाई करके समय का सदुपयोग करो और अपना सपना माँ-बाप के आगे पूरा करो।

दोस्तों आगे का लेख रहेगा ''  ''पद्मभूषन''सन्मान'' इस लेख में डॉ.विक्रम साराभाई के अधूरे सपने अब्दुल कलाम कैसे पुरे करते है, जरूर पढ़िए।


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2 डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम कैसे बने मिसाईल मैन ?

3  डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम कैसे किए  '' रोटो '' का निर्माण 

4 डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम ''पद्मभूषण'' से सम्मानित

5 मिसाईल मैन के '' मिसाइलों '' की जानकारी

6 2020 साल में भारत एक विकसित देश बन जाएगा

7 डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम भारत के 11 वे राष्ट्रपति और '' भारतरत्न '' से सम्मानित
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