डॉ.ए.पि.जे अब्दुल कलाम ''पद्मभूषण'' से सम्मानित / Dr. A.P.J Abdul kalam honored with ' padma Bhushana '

Dr. A.p.j. Abdul kalam honored with '' Padma bhushana ''

डॉ.विक्रम साराभाई अवकास प्रोद्योगिकी और संशोधन के महानायक दुनिया में नही रहे। डॉ विक्रम साराभाई के कार्य का स्मरण रहने के लिए थुंबा के रिसर्च सेंटर का नाम ' विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर ' ( विक्रम साराभाई अवकाश केंद्र ) रखा गया।


'रोटो' प्रकल्प का काम डॉ.विक्रम साराभाई थे तभी पूरा हो चूका था। लेकिन उसकी चाचणी उनके आखों के आगे नही हुई थी इसलिय अब्दुल कलाम और नारायण जी को पछतावा हो रहा था। उसकी चाचणी दि.08अक्टुम्बर 1972 में उत्तर प्रदेश के बरेली एअर फ़ोर्स स्टेशन पर हुई  इसलिय सुखोई 16 जेट विमान दो किलोमीटर धाव पट्टी से रनिग होकर उड़ने की बजाय 66 रेटो मोटर का उपयोग करके 1200 मीटर तक रनिग होकर आकाश में उड़ने लगा।



परदेश में इस मोटर की कीमत ३३००० /- रु. लेकिन भारतीय बनावटी रेटो मोटर की किंमत मात्र १७००० /- रु. थी इस संशोधन के कारन भारत सरकार के लाखो रु अब्दुल कलाम और नारायण ने बचा दिए।

विक्रम साराभाई अवकाश केंद्र में एस.एल.व्ही-3 प्रकल्प का काम सन 1973 में सुरु हुवा। यह प्रकल्प बहुत बड़ा था उसके 44 सब सिस्टीम्स तयार करना था। उस मे 250 छोटी-बड़ी यंत्रणा थी इसके लिए 10 लाख भाग की चेकिंग करना था इस प्रकल्प का काम 10 साल चलनेवाला था उनके पास संशोधक और इंजिनीअर थे। श्रीहरिकोटा में इंधनउत्पादन और थुंबा में रॉकेट की चाचणी यह दोनों काम करना पड़ता था। सन 1975 में अवकाश यान के यंत्रणा तयार करके उसकी उडान सन 1976 तक होनी चाहिय ऐसी योजन अब्दुल कलाम जी ने बनाई थी सन 1978 में उसकी लास्ट उडान होगी यह उन्हों ने निचित किए थे।

जून 1974 में 'सेंटर साऊडिंग रॉकेट लॉन्च' का उपयोग कर के रॉकेट उड़ान के लिए बहुत  चाचणीयों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। इस कारण जुलाई 1974 को लोकसभा में सरकारने जाहिर किया की भारत के विज्ञानिको ने पहिला उपग्रह डिझाईन किया है और इसका काम प्रगति से चल रहा है और सन 1978 तक अपना पहिला उपग्रह आकाश में प्रसारित किया जाएगा। इस बात से अब्दुल कलाम बहुत खुश थे लेकिन ख़ुशी के साथ-साथ दुःख भी था क्यों की उन के मार्गदर्शक जलालुदीन का निधन हो गया .सन 1976 में उनके पिताजी का निधन हुवा उनके प्रेरणा स्थान थे उसके बाद उनके माताजी का निधन माता जिक्के निधन के दिन ही उन्हें फ़्रांस जाना था। माता-पिता के दुःख भूल के उन के स्मृति की प्रेरणा लेके अब्दुल कलाम फ़्रांस गए।एस एल व्ही-3 के चाचणी पूरी होने के बाद ही अब्दुल कलाम जी भारत वापस आए।



भारत आते समय उनको एक अच्छी खबर सुनने को मिली की अवकाश वैज्ञानिक के पितामह के नाम से जाने जाननेवाले दुसरे महायुद्ध में बम्ब व्ही-2 क्षेपनाशस्त्र के जनक ' वर्नर व्हान ब्राउन ' थुंबा प्रकल्प को व्हीजित देनेवाले थे।इस व्हिजिट में भारतीय एस एल व्ही-3 का डिझाईन देखा। मार्गदर्शन में उन्होंने कहा की '' सफलता को भी विफलता का सामना करना होगा इसलिय अवकाश संशोधन यह तुमारा व्यवसाय मत बनने दो उसे अपना लक्ष्य,ध्यान और धर्म बनालो।

इस उपदेश की प्रेरणा लेकर डॉ अब्दुल कलाम ने एस एल व्ही प्रकल्प की प्रथम चाचणी 10 अगस्त 1979 को हुई। इस वाहक ने आकाश में सफलता पूर्वक प्रसारित हुवा प्रथम टप्पा पूरा हुवा लेकिन दूसरा टप्पा असफल रहा और श्रीहरिकोटा से 560 किलोमीटर दुरीपर समुद्र्र में गिरा लेकिन इस असफल चाचणी से अब्दुल कलाम घबराए नही हार,नही माने, निराश नही हुए वर्नर व्हान के उपदेश की बाते मन ही मन में जागृत हुई और अपने काम में लग गए।


'एस एल व्ही ' इस यंत्र में जो बिघाड था उसे सुधारा गया और एस एल व्ही इस उपग्रह वाहक के माध्यम से १८ जुलाई 1980 को '' रोहिणी '' यह उपग्रह सुबह 08 बजकर ०३ मिनट पर सफलतापूर्वक आकाश में प्रसारित किया गया। कुछ समय बाद उपग्रह पृथ्वी के पास घूमने लगा भारत के नया अवकाश प्रक्षेपण क्षेत्र की सफलतापुर्वक चाचणी देखते हुए अब्दुल कलाम के साथ साथ सभी वैज्ञानिक खुश हो गए।  इस नेत्रदीप सक्षमता के कारन भारत सरकार ने डॉ ए पि जे अब्दुल कलाम जी को दि 26 जनवरी 1981 को प्रतिष्टित 'पद्मभूषण' पुरस्कार देकर सन्मानित किया गया।

डॉ अब्दुल कलाम जी ने और पुन्हा 31 मे 1981 को '' रोहिणी '' वाहक की सफलतापूर्वक चाचणी परीक्षण लिय।   उपग्रह प्रक्षेपण यंत्रणा में भारत विश्व के कुछ देश के साथ भारत का भी नाम जुड़ गया। डॉ अब्दुल कलाम जी ने 100 % भारत के तंत्रज्ञान का उपयोग करके बहुत बड़ी सफलता हासिल की है।

'' रॉकेट इंजिनीअर से मिसाईल मैन '' बनने की यह प्रथम सफलता थी।   


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