धीरूभाई अम्बानी बिजनेस मैन कैसे बने ? / How did Dhirubhai Ambani become a Business Man?



Dhirubhai Ambani

धीरूभाई अंबानीजी का बहुरंगी व्यक्तिमत्व था। पेट्रोल पम्प पर काम करते समय बर्मा शेल जैसी कंपनी का  मालक बनने का सपना देखते थे। किशोरवय में सभी ऐसा सपना देखते है लेकिन यह सपना हकिगत में साकार करने के लिए अपना काम करने का तरीका बदल दिया। आनेवाले दिनों में उनोन्हे खुद की कंपनी की स्थापना की और अपने नाम का डंका विश्व में बजाया।

रिलायन्स इंडस्ट्रीज औद्योगिक साम्राज्य की स्थापना करते समय प्रधानमंत्री से दोस्ती की,1966 में एक ही दरवाजे पर अपने नाम की नेमप्लेट लगाई और दो दशक में रिलायन्स का बहुत बड़ा साम्राज्य हुवा उनकी बिक्री 900 कोटि हुई। और देश के 10 कंपनीयों में उनके कंपनी का नाम आया। लेकिन अंबानी उतने में समाधानी नही रहे उन्होंने १९८४ में बिजनस कैसा करना चाहिए इसलिए एक 10 साल का प्लान तयार किया उसमे लिखा की आने वाले 10 सालों के अन्दर नई कम्पनियों का निर्माण करना है,जो चालू कम्पनी है उसमे नये विभाग चालू करना है और 10 साल में रिलायन्स 8000 कोटि रूपये का कारोबार करने वाली कम्पनी बन जाएगी ऐसा अंदाज उन्होंने निकाला था। उस समय उनके इस अंदाज पर बढे-बढे उद्योगपति हसने लगे थे, लेकिन अंबानी ने कर के दिखाया। 1995 में उसकी बिक्री ७८०० कोटि हुई, और अंबानी यह '' ऐंबिशन '' और '' पैसा '' इसका दूसरा नाम है ऐसा कहा गया।


धीरूभाई अंबानी जी का पारिवारिक जीवन 

मा.धीरूभाईजी का पूरा नाम :- धीरजमल हीराचंद अम्बानी है, और वे धीरूभाई अंबानी के नाम से जाने जाते है। धीरूभाईजी की पढ़ाई:- 10 वी कक्षा तक, उनके माता जी का नाम :- जमनाबेन है। धीरूभाई का जन्म :- 28 दिसंबर 1932 को हुवा। धीरूभाई के पत्नी का नाम :- कोकिलाबेन है। धीरूभाई को 2 लड़के और 2 लड़किया है, (मुकेश, अनिल, दीप्ती, निशा ) गुजरात के जूनागढ़ जिल्हे के छोरवाड में धीरूभाई के पिताजी मा.हीराचंद अंबानी स्कुल में टीचर थे।

सबसे बड़े भाई रमणिकलाल कहते है, '' धीरूभाई हमेशा पैसा कहा से कमाया जाता है, इसकी योजना पर ज्यादा से ज्यादा विचार करते थे।

धीरूभाई जी ने शिवरात्रि के यात्रा में गुजराथी गाठिया बेचे थे , धंदा करने के लिए धीरूभाई सायकल से गांव- गांव जाकर धंदा करते थे , और ऑर्डर्स लेते थे।

टीचर को ज्यादा पगार नहीं मिलता है,और गांव के टीचर को अपने लड़कों को पढाना बहुत ही मुश्किल था। रमणिकलाल दसवीं के बाद नौकरी के लिए एडन (यमन ) चले गए और मुझे नोकरी मिलगई ऐसा बताया और धीरूभाई भी एडन को गए।

सबसे छोटा लड़का नटवरलाल को कॉलेज की पढ़ाई करने का मौका मिला,एडन को दोनों लडके कमाने लगेऔर पैसा घर में भेजने लगे अब नटवरलाल को मुंबई के अच्छे कॉलेज में पढ़ाई के लिए भेजा जाना चाहिए ऐसा  हीराचंद को लग रहा था। नटवरलाल पढ़ाई करेगा, नौकरी पर लगेगा और गरीबी से ऊपर आकर मध्यमवर्ग की तरह अपना जीवन व्यापन करेंगे ऐसा हीराचंदजी को लगता था, लेकिन बहुत ही अलग हुवा, यह  साक्षात धीरुभाई ने करके दिखाया उनके काम की '' फॉच्युन '', फिनान्शिअल टाइम्स, इस्टर्न इकोनॉमिक रिव्ह्यु इनको दखल लेना पढ़ा।

उम्र के 17 वे साल में धीरूभाई एडन में नोकरी करने गए और वे अपने आप में कमिटमेंट करते थे की मैं जो काम करू उसमे मुझे सक्सेस मिलना चाहिए इस बात पर ज्यादा ध्यान देते थे।

एडन में '' बर्मा शेल '' कंपनी ने 1953 में तेलशुद्धीकरण का कारखाना निकाला था इस कारखाने में धीरूभाई को नौकरी मिली उस समय उनका पगार था 300/- रु.और इस कारखाने में काम करते समय उन्हें बहुत कुछ शिकने को मिला।



धीरूभाई अंबानी ने पेट्रोल पम्प पर काम किया कुछ दिनों के बाद विक्री व्यवस्थापन पद पर उनका प्रमोशन हुवा उसके बाद ए.बीझ एण्ड कं. में ( बर्मा सेल की उपकंपनी ) पांच साल कारकुनि किए और उनका अरबी भाषा का ज्ञान बढ़ते गया उन्होंने नौकरी छोड़ी तब उनका वेतन 1100 /- रु. था।

बर्मा सेल कंपनी में काम करते समय उसक कंपनी को धीरूभाई देख रहे थे। धरूभाई कहते है , हमारे को दस रु खर्च करना बहुत ही मुश्किल था। और धीरे-धीरे बर्मा सेल जैसी कंपनी चालू करने का सपना धीरूभाई देखने लगे।

धीरूभाई ने एडन में आठ साल नौकरी किए वहा पर वे बहुत खुश थे, फ्लॅट था , गाड़ी थी लेकिन खुद का धंदा करने की इच्छा थी। वे 31 दिसंबर 1958 को मुंबई आए उस समय उनके पास कुछ हजार रु. थे और उन्हें बिजनस डालना था।

मुंबई में अंबानी परिवार रहने लगा, धीरूभाई के पिताजी हीराचंद अंबानी का मृत्यु 1951 को हुवा उस समय धीरूबाई 19 साल के थे। मुंबई में कबूतरखाना के पास फ्लॅट किराया से लिए और रहने लगे।

धीरूभाई ने 15,000/-रु. का कर्जा निकाल के '' रिलायंस कमर्शियल कार्पोरेशन '' नाम से व्यापार पेढ़ी चालू किए। ऑफिस के लिए जगह उधार लिए थे। रिलायंस कमर्शियल कार्पोरेशन के माध्यम से कुछ चीजों की निर्यात करते थे ( वेळचि, ,मिरि, हल्दी, काजू )

अनिल अंबानी कहते है, मेरे पिताजी मसाले के साथ-साथ सक्कर, तूप , रेत , माती यह सभी निर्यात करते थे। एक अरबी को रेगिस्थान में गुलाब लगाना था और इसके लिए मिटटी चाहिए थी इसका टेंडर धीरूभाई को मिला और उसे मिटटी दिए और उसने हमें पैसे दिया। अब वो अरबियन भाई साहब मिटटी को खाते है या समुंदर में फेकते है, हमें पता नहीं, हमें अपना धंदा करना था दोस्तों इस तरह जीवन में मौका मिले तो छोड़ना नहीं चाहिए।उनके पास पैसा आना चालू हुवा और वे शहर के हिसाब से खर्चा करने लगे वे बड़े बिजनस मैन के तरह रहने लगे फाइवस्टार होटल में 65/-रु. की चाय पिने के लिए जाते थे। यह सभी बाते बर्मा शेल कंपनी से शिख के आए थे।

अपना विकास देश का विकास 


धीरूभाई अंबानी का सूत का धंदा था। फेब्रु 1966 में कै.आदित्य बिर्ला एंडियन रेयॉन कंपनी खरीदने के लिए बात कर रहे थे उसी समय अम्बानिने अहमदाबाद से 20 किलो दूरि पर नरोदा यहाँ नई सूत की मशीन लगाई। बिर्ला ने इंडियन रेयॉन खरेदी करने के लिए 30 लाख रु दिए और अम्बानी का भांडवली खर्च बिर्ला के एक दशांस था।
उन्होंने कर्जा लिए हुए पैसे से 2 लाख 80 हजार रु की मशीन खरीदी, उस समय अम्बानी 34 साल के थे और बिर्ला 23 साल के थे।

धीरूभाई अम्बानी ने 15 लाख रु. कर्जा लेकर के '' रिलायन्स टेक्स्टाइल इंडस्ट्रीज '' की स्थापना किए। कपड़ा बनाने की मिल लगाई थी (नरोदा प्रकल्प) और कच्चा माल लाने के लिए उनके पास  उस समय  2 लाख 80 हजार रु.जमाना बहुत बड़ी बात थी। उस समय वीरेन शहा यह उद्योगपति थे शहा भी छोरवाडा के रहनेवाले थे। शहा परिवार छोरवाडा के बड़े जमींदार थे।



धीरूभाई अम्बानी को कपडा बनाने की मिल लगाना था इसलिए शहा परिवार से 4 लाख रु. कर्जा माँगा उस समय शहा कह रह थे की , '' यह प्रकल्प चलेगा नहीं, लेकिन यह सब गलत था, 70 मजदुर काम कर रहे थे मिल में पहले साल में 09 कोटि की बिक्री हुई और 13 लाख रु.का फायदा हुवा। 1977 में कंपनी शेअर बाजार में उतरी तब कंपनी का उत्पादन 70 कोटि और नफा 4 कोटि 33 लाख पर पहुँचा था।

नरोदा प्रकल्प धीर-धीरे बढ़ने लगा क्यों की बिक्री बढ़ रही थी 1966 की मालमत्ता 2 लाख 80 हजार से बढ़कर 1977 में 14 कोटि 50 लाख, 1979 को दुप्पट बढ़कर के 37 कोटि पर पंहुचा। रिलायंस ने पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र में पदार्पण किया और 1983 में देश की सबसे बड़ी कंपनी '' रिलायंस '' बनी। 2 लाख 80 हजार चौ. मी क्षेत्रफल में कंपनी थी और उसमे 30 लाख चौ. मीटर कपड़ा बनाते थे, कामगार की संख्या 10 हजार थी।

बिजनेस बढ़ने लगा तभी उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों की मदद ली। रमणिकलाल एडन से अहमदाबाद आए और नरोदा का प्रशासन , उत्पादन की जबाबदारी उनकी तरफ दी। रसिक मेसवानी और नटवरलाल यह मुंबई कंपनी के अर्थ खाते की जबाबदारी संभालने लगे। एडन के उनके सहकारी मित्र इन्दुशेठ यह भी अर्थ खाते की जबाबदारी सभालने लगे इन्दुशेठ धीरूभाई की तरह निर्यात कंपनी में कारकुन थे। इंदूसेठ के भाई एम.एफ सेठ यह रिलाएंस के निर्यात निति बनाने लगे। 1975 में जागतिक बैंक के पथक ने देश के 24 कपडा मिल को व्हीजिट दिए और सर्वे के नुसार रिलायंस की कपडा मिल देश की नंबर 1 कपडा मिल थी।

धीरूभाई ने अपना कपड़ा बेचने के लिए हिन्दुस्थान लिव्हर जैसे कम्पनी के बराबर विज्ञापन पर पैसा खर्चा करने लगे,बड़े-बड़े पोस्टर लगाए,आकाशवाणी,दूरदर्शन,पेपर के माध्यम से विज्ञापन किए, सिर्फ ''विमल'' की घोषणा किए, रमणीलाल का लड़का और धीरूभाई का भतीजा इसका नाम''विमल'' था, यही नाम रिलायंस
कंपनी ने अपने वस्त्र को दिया।और आज बड़े-बड़े शहरों  में विमल कंपनी के बड़े-बड़े शोरूम और दुकान है।  

दोस्तों आगे की जानकरी अगले लेख में दी जाएगी तब तक के लिए बाय-बाय...........!

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