मेरे सफलता का रहस्य / The secret of my success


safltaka rhsy

सफलता का नियम है अपनी सफलता के लिए सोचना बंद कीजिये। केवल अपनी टीम की सफलता के बारे में सोचिये आर.सी.एम में आपको अपनी सफलता के लिए सोचने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं है बल्कि अपनी सफलता के बारे में जो ज्यादा सोचता है लोग उसे कम पसंद करते है। उसमें स्वार्थ भावना कही न कहि  दिखाई देने लग जाती है। जिससे लोग उससे कटना शुर हो जाते है और आरसीएम में सबसे बड़ी आवश्यकता यदि कोई है तो वह है टीम का विश्वास जो टीम की सफलता का ध्येय बना लेता है उसकी टीम भी उसको सफलता के शिखर पर देखना चाहती है। 


जो इंसान अपने बारे में ही सोचता है उसे सिखने को कम मिलता है , लेकिन जो दरों की सफलता को अपना मकसद बना लेता है उसे सिखने का बहुत बड़ा माध्यम मिल जाता है। दूसरों के विचारों को सुंदर मोड़ देने के लिए इंसान को जो करना पड़ता है वह सिखने ले लिए सबसे बड़ा जरिया है। प्रतिदिन जब इंसान यह सोचता है की मुझे लोगों को सफलता के लिए तैयार करना है, उनको सफल बनाना सीखना है और हर हालत में उनको सफल बनाना है तो उसके स्वयं के विचार ही उसको बहुत कुछ सीखा देते है। उसके विचारों में दूरदर्शिता का समावेश हो जाता है। उसके विचारों में इंसानियत का समावेश हो जाता है। उसके विचार एक बहुत ही व्यावहारिक तरिके पर काम करने लग जाते है। इससे जीवन में जो उन्नति होती है वह अपने आप में आनंददायी होती है। यह बहुत जरूरी है की यह सब कुछ भीतर की भावना में होना चाहिए। ऊपर-ऊपर से आप यह कह रहे है की मै तो सिर्फ दूसरों की सफलता के बारे में सोचता हूँ  लेकिन मन में केवल आप अपने लिए ही सोचते है तो स्थिति और बिगड़ जयेगी। आप यदि यह समझते है की आपके मन की बात दूसरों को पता नहीं चलती है तो यह गलतफहमी है। 

मन की बात आपके आचरण में आए बिना नहीं रह सकती है। जो लोग अंदर कुछ और होते है और बाहर कुछ और दिखाने की कोशिश करते है वे सिर्फ नफरत के पात्र ही बन सकते है। उनकी चापलूसी भरी बातें लोगों को उनसे दूर करती जाती है। लोग भी आपके साथ उसी तरह का व्यवहार करना सुरु कर देते है। वे भी आपकी बातें अंदर से नहीं मानते है, केवल दिखते है कि वे आपकी बातें मान रहे है। जो भी आपका संबंध लोगों से बनता है वह सिर्फ दिखावटी व् कमजोर होता है।जो आर.सी.एम के लिए बिल्कुल भी उपयोगी नहीं है, बल्कि बहुत बड़ा बाधक है। यह कार्य पूर्ण रूप से भावनाओं और सबंधो का है जिसमें पूर्णतया सत्यता का होना जरूरी है जैसे ही आप अपने भीतर यह भाव पैदा करते है की मुझे औरों को सफल बनाना है और यदि इस भाव में एक सच्चाई है, एक इच्छा शक्ति है,एक मात्र लक्ष्य के रूप में आपके जीवन में स्थान ले लेता है तो आप अपने आप में एक आश्चर्य जनक परिवर्तन का एहसास करेंगे। ऐसी बहुत सी बाते जिनको सीखने के लिए आप बहुत प्रयास कर रहे थे वे सहज रूप से आपके स्वंय के भीतर पैदा होने लग जाते है। पहले आपका जोर ज्यादा सिखने पर रहता था अब जोर सिखाने पर बढ़ गया है और जब इंसान सच्चे दिल से किसी को सिखाने लगता है तो सबसे ज्यादा वह स्वंय सीखता है। सीखने का इससे बढ़िया तरीका कोई हो ही नहीं सकता। 



पहले सिखने का प्रयास करते थे, कभी भी उतनी गंभीरता आ नहीं पायी। बातें सुनी,बातें पढ़ी पर बदलाव नहीं हो पाया आचरण में वे बातें लाना बड़ा मुशिल हो रहा था, पर अब बिना सुने और पढ़े ही बहुत बदलाव आने लग गया है। मन ऐसा सोचता है कि मुझे सिखाना है इसलिए पहले मुझे ऐसा बनना जरूरी है और सहर्ष मन उन बातों को मानने  के लिए तैयार हो रहा है। इस प्रवृति को आप अपने भीतर और विकसित होने देंगे तो आप अपने भीतर बहुत बड़ा परिवर्तन देख पाएंगे जिसको देखकर आप न केवल आश्चर्यचकित होंगे बल्कि आपका विश्वास अपने आप के प्रति बहुत अधिक बढ़ जायेगा। 

जिनको आप सफल बनाना चाह रहे हो उनमे से बहुत सरे लोग जब उस तरह से तैयार नहीं हो पाएंगे जैसे आप उनको बनाना चाह रहे हो तब आपके सामने एक नई चुनौती कड़ी होगी और वही चुनौती आपको कई सारि नई नई चीजें सीखा जाएगी। आप ऐसे तरीकों की खोज में लग जायेंगे जिससे उनको सफलता के लिए तैयार किया जा सके। प्रतिदिन आप बेहतर तरीकों पर काम करना शुरू कर पाएंगे। इस सारि स्थिति का परिणाम जो भी हो लेकिन यह निश्चित है की अदि आप अपने संकल्प पर टिके रहे तो आपको जितना सीखने को मिलेगा वह दुनिया  की किसी पाठशाला में नहीं मिल सकता। इस बात की परवाह करना भी मत की अब  परिणाम आए सिर्फ इस बात को देखना की आप कितना सिख पाए और जीवन में कुछ पा लेने से ज्यादा जरुरी है कुछ बन जाना, कुछ महत्वपूर्ण  अनुभवों से गुजर जाना। दरअसल जिंदगी में कुछ सिखने का, कुछ बनने का यही एक मात्र तरीका है। 



हम यदि यह समझ रहे है की स्कुल-कॉलेज में पढ़कर कोई व्यक्ति जिंदगी जीने के लिए निपुण हो सकता है तो यह हमारी गलतफहमी है। जिंदगी जीने के लिए जिंदगी में तरना पड़ता है। वही सब कुछ सीखा जा सकता है। सबसे बड़ा सत्य यह है की इंसान की सफलताएँ  उतना नहीं सीखा सकती जितनी असफलताएं। इसलिए लक्ष्य अच्छा हो तो असफलता से डरने की आवश्यकता नहीं है और कुछ नहीं तो सिकने को तो कुछ मिलेगा ही मिलेगा। बाकि जीवन में जो भी हो लेकिन आरसीएम में दूसरों को सफल बनाने का लक्ष्य ही कोई लक्ष्य हो सकता है। स्वंय की सफलता का और कोई आधार है ही नहीं। बस ऐसी बात में पारंगत होना है , ऐसी राह पर बढ़ते रहे तो एक दिन आप दूसरों को सफल बनाने की कला में निपुण हो जायेंगे। 

दूसरों की सफलता का लक्ष्य लेने से एक और परिवर्तन जो आप महसूस करेंगे की आपका संकल्प पहले से बहुत ज्यादा मजबूत हो गया है, पहले थोड़ी लापरवाही आ जाती थी। कभी मुड ख़राब हो जाता था पर अब आपकी वचनबद्धता बहुत बढ़ गई  है। अपने प्रति इंसान लापरवाह हो जाता है पर जब बात दूसरों की आ जाती है तो थोड़ा गंभीर हो जाता है। जिस प्रकार माँ खुद के प्रति लापरवाह हो जाती है लेकिन बच्चों के प्रति वह बहुत गंभीर होती है। उसी प्रकार इंसान जब दूसरों की सफलता को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेता है तो उसमें मातृत्व भाव पैदा हो जाता है और वह फिर कष्टों को नहीं देखता है वह सिर्फ अपने संकल्प को पूरा करना चाहता है। यही वचनबद्धता किसी भी इंसान को उसकी सही अवस्था में लेकर आती है। यही से इंसान अपनी सच्ची इंसानियत के दर्शन कर पाता है। यहा पर ही उसे सच्चे सुख का ज्ञान होता है की सुख पाने में नहीं है सुख देने में है। 



ऐसी लक्ष्य की वजह से आप एक और परिवर्तन अपने भीतर देख पाएंगे वह आपकी व्यवहार कुशलता में आप लोगों से पहले की अपेक्षा ज्यादा प्यार करने लग जायेंगे, उनके साथ नाराजगी भरे शब्दों का उपयोग नहीं करेंगे। उनका दिल न दुखे इस बात का पूरा ख्याल रखेंगे। आपके लिए वे बहुत महत्वपूर्ण बन जायेंगे। इंसान जब खुद की सफलता के बारे में सोचता है तो वह दूसरों की भावनाओं का उतना ख्याल नहीं रख पता है। लेकिन जब दूसरों की सफलता के बारे में सोचता है तो उनकी भावनाएँ उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है और स्वतः ही उसका व्यवहार उनके प्रति अच्छा हो जाता है। वह उनको पूरी तरह से अपने साथ जोड़े रखना चाहता है। वह चाहता है वे लोग उसकी बातें सुने। उसके साथ बैठकर योजना बनाए, मिलझुलकर तयारी करें। इसके लिए आवश्यक है विचारों का तालमेल व् अच्छे संबंध। इस प्रकार संबधों के प्रति जागरूकता बहुत बढ़ जाती है। शब्दों में मिठास बढ़ जाती है, व्यवहार में आत्मीयता बढ़ जाती है, अपने द्वारा दिए गए वादों को पूरा करने में जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है। 

दरअसल यहाँ एक बहुत बड़ा अंतर हो जाता है। स्वंय की सफलता के उद्देश्य में दूसरों का उपयोग अपनी सफलता के लिए करने का भाव ज्यादा रहता है।  जबकि दूसरों को सफल बनाने के उदेश में स्वंय का उपयोग दूसरों की सफलता के लिए करने का भाव ज्यादा रहता है। 

जिंदगी का असली आनंद प्राप्त करने का यह एक अचूक मन्त्र है , इसका पूरा लाभ उठाने के लिए आवश्यक है की आप जिनको सफल बनाना चाहते है उनकी सूचि आप बना ले। '' जो हो जायेगा वह हो जायेगा और जो रह जायेगा वह रह जायेगा। '' इस निति में सोच में गहराई और कार्य में गुणवत्ता नहीं आ पायेगी कार्य करने के रास्ते में स्पष्टता नहीं आ पायेगी। जिम्मेदारी की भावना अपूर्ण रह जाएगी। इसलिए अच्छी तरह सोच समझकर जो लोग स्वंय भी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हो उनकी सूचि बना लीजिये जिन लोगों को आप सूचि में ले रहे हो उनके द्वारा बनायी गई सूचि स्वंय ही आपकी सूचि में शामिल होती जाएगी। आपकी सूचि में से कोई भी कम हो जाता है या कमजोर हो जाता है तो ध्यान रखना अपने कार्य करने के तरिके में कुछ कमी रही है। इस पर आपको विचार करना है और सुधार करके अपने कार्य को आगे बढ़ाना है।           

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