राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज / Rashtrasant Tukdoji Maharaj


Tukdoji Maharaj

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज  मानववता के पुजारी, विश्वात्मक बंधुभाव, विश्वप्रेमी, एकतावादी थे। तुकडोजी महाराज कहते है ,'' हम जिस गांव में रहते है, गांव अगर सुन्दर स्वच्छ आदर्श नहीं है, हम विश्व के सुंदरता का विचार करते है, तो यह विचार व्यर्थ हिन् है।   

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के विचार हमारे लिए अमृत धारा है, उन्हे घर का उद्धार, ग्राम का उद्धार  राष्ट्रउद्धार , विश्वउद्धार के लिए अपने वाणी से लोगों को मानवता का पाठ पढ़ाते थे। 


राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज कहते है .......  

विश्वब्रम्ह बोलत गेला। सभोवती समाज दुःखी बुडाला। 
ग्रामसेवा नकळे त्याला। त्याचे ज्ञान व्यर्थचि। 

दूसरों की हसी उडाने वाले बुवाबाज, देवऋषि,बहुरूपी इसके जैसे लोग समाज का मानसिक और शारीरि शोषण करते है यह राष्ट्रसंत को पसंद नहीं है ,  वे चाहते है , समाज सेवा करनेवाला , विश्व निर्माण करनेवाला , समाज के हितके लिए विकास के कार्य करनेवाला होना चाहिए तभी हमारा गांव,राष्ट्र और विश्व सुंदर बनेगा।

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का परिचय    

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का जन्म 30 अप्रेल 1909 को अमरावती जिल्हे के '' यावली '' इस गांव में हुवा है। उनके पिताजी का नाम :-बंडोजी उर्फ़ पांडुरंग इंगले , उनके माताजी का नाम :- मंजूळा , राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के गुरु :- आडकोजी महाराज।  राष्ट्रसंत तुकडोज का नाम '' माणिक '' है। तुकडोजी महाराज के मुँह में भाकर(रोटी) का तुकड़ा आडकोजी महाराज ने डाला और तुकड्या-तुकड्या करके बुलाया इसलिए उन्हें तुकडोजी  कहते है,और उन्होंने राष्ट्रहित के लिए कार्य किये इसलिए वे राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के नाम से जाने जाते है। 

बंडोजी उर्फ़ पांडुरंग यह टेलर ( शिम्पी )थे,लेकिन वे अपने काम के तरफ ध्यान नहीं देते थे। व्यसनाधीन थे वे गांजा पिने में ही अपना दिन ख़राब करते थे। उनका अपने धंदे के तरफ ध्यान नहीं था। वे कर्जबाजारी थे। बंडोजी यावली से चंदुरबाजार को आए और तुकडोजी का नाम स्कुल में भर्ती किए। उनका ध्यान भक्ति मार्ग में था वे अवलिया जैसे दिखते थे। उनका आवाज पहाड़ी था लेकिन मधुर आवाज था। उनके भजन में मधुरता थी और जनसमुदय उनके भजन सुनने में लीन हो जाते  थे। 

 मारोती के मंदिर में भारतीबुवा रहते थे। उन्हें गाने, बजाने का शौक था। भारतीबुवा के पास तुकडोजी गाने में कुशल हुवा। पढ़ाई में भी वे बहुत आगे गए थे। भारतीबुवा के संगीत के संस्कार तुकडोजी महारज ने ग्रहण किए। 

तुकडोजी महाराज की वृत्ति दान देने की थी। अपने घर का सामान वे किसी को भी देते थे। मारोती की मूर्ति उन्होंने अखाडा में दान दे दिए और अपने मंजूळा माई के उपवास के लिए कपडे शीलवाने की मशीन बेच दिया। इस कारन तुकडोजी महाराज को बहुत मार मिली थी। तुकडोजी महाराज अपने घर का सामान देते थे इस कारन उनके पिताजी ने उन्हें घर से बहार निकाल दिए। और तुकडोजी  महाराज वरखेड को चले गए। 

भारतीबुवा के कारन उन्हें खँजेरी बजाना शिख गए। इसी खँजेरी के कारण उन्हों ने स्वतंत्रा का आंदोलन आगे बढ़ाया। तुकडोजी महाराज को खँजरी बजाना और खँजरी का राग और संगीत में वे निपुण हो गए थे। उनके पास हमेशा खँजरी रहती थी। 

मंजूळा माई और तुकडोजी महाराज वरखेड को चले गए। तुकडोजी आडकोजी के मठ में आ गए। गुरु का साथ उन्हें मिला गुरु की सेवा करने का मौका उन्हें मिला। उनका तन-मन पवित्र होने लगा। गुरु सेवा करने का उन्हें मौका मिला और वे संत तुकाराम का भजन करते थे। एक दिन आडकोजी महाराज बोले '' अरे , ' तुका -तुका क्या बोल रहा है, तुकड्या तुकड्या बोल इस कारण काव्य की रसधारा बहने लगी। 



राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के कार्य / Work of Rashtrasant Tukdoji Maharaj

भाषण, कीर्तन और भजन इन माध्यम से उन्होंने राष्ट्रजागृति के महान कार्य किय। भारत के समाज के अनिष्ट रूडी और प्रथा बंद किए। पशुहत्याबंदी, व्यसनमुक्ति, अस्पृश्योद्धार, जातिनिर्मूलन, यात्राशुद्धि, कुटुंबनियोजन, हुंडाबंदी इत्यादि के प्रति लोकजागृति किए।   

'' जानसेवा हीच ईश्वर सेवा है '' यह उपदेश उन्होंने लोगो को दिया। इ.स 1935 में मोझरी में '' गुरुकुंज '' आश्रम की स्थापना किए।    

तुकडोजी महाराज कहते है ,......

'' सद्गुरु आडकोजिने मुझपर कृपा सिंचन किया। 
तुमभी भजन लिखते रहो यह आशीष मुझको दिया। 
तबसे भजन बढ़ा, इ हातसे संभाले नहीं। 
गंगा प्रवाती वाक्य रचना सहज होती गयी ।।

तुकडोजी महाराज खुद भजन लिखते थे और भजन अपने आवाज में गाते थे। तुकडोजी महाराज को नोकरी करने की इच्छा नहीं थी। उस समय सातवा वर्ग पढ़े लिखे को पटवारी की नौकरी मिलती थी। उन्हों ने लोगों उद्धार का कार्य हाथ में लिया। लोगों का मनोरंजन करते करते समाज प्रबोधन के कार्य करते थे। 

दि. 14 / 11 / 1921 को कार्तिक पोर्णिमा को मंगल को दोपहर 12 बजे.आडकोजी महाराज ने समाधी लिए।

तुकडोजी महाराज का घराना वारकरी पंथ का है। विट्ठल भक्ति में वे लीन थे। उनके आँखो में पंढरपुर का विठुराया दिखता था। 

 तुकडोजी महाराज भगवान को ढूढ़ने के लिए रामटेक के नारायण टेकड़ी गए। महाराज नारायण टेकड़ी पर रहने लगे यहां पर उनकी मुलाखत सीतारामदास स्वामी के साथ हुई। वहा पर उन्हें एक योगी पुरुष मिले वे नारायण स्वामी होंगे और तुकडोजी को अकेले लेके गए। उनकी और से पुरे योग, अष्टांग उन्हें प्राप्त हुये  उनके कृपा दॄष्टि से महाराज को दिव्य ज्ञान प्राप्त हुवा और बालयोगी के नाम से तयार हुए। 

विदर्भ का सबसे बड़ा जंगल नेरिका है, ताडोबा- सतबहिनिगिरि यह बहुत बड़े जंगल है। कोलाम जात के आदिवासी इस जंगल में रहते थे। नेरीके इस जंगल के आदिवासी को मानवता का पाठ पढ़ाया। पशु की हिंसा नहीं करना चाहिए, मुर्गा-बकरा भगवान के बलि नहीं देना चाहिए। 

मेहरबाबा तुकडोजी महाराज को दि. 20 नोहंबर 1937 को मिले मेहरबाबा बोलते नहीं थे वे अपने सांकेतिक भाषा में बात करते थे। उस समय महाराज की उम्र 17 साल की थी। अवलिया जैसे वे रहते थे। उन्हें देख कर मेहरबाबा का भक्त कहने लगा '' Look Baba a Drunkar has come to see you '' लेकिन उसपर मेहर बाबा ने सांकेतिक भाषा में उनसे कहा, '' No No he has drunk a wine of love '' सच्चे संत ही आदमी को पहचान ते है। तुकडोजी महाराज मेहर बाबा को बोलते थे,'' वह तो प्रेम का सच्चा पुजारी है '' 


खँजेरी के भरोसे पर अंग्रेजो के साथ आंदोलन चालू किया , महाराज कहते थे।  ........ 

'' काहे को धूममचातहो। 
दुःख वकार भारत सारे। 
यते है नाथ हमारे '' 

'' पत्थर सारे बॉम बनेंगे। 
भक्त बनेगी सेना  '' 

'' रनि घ्या प्राण खोवनी ''          

तकडोजी महाराज को नागपुर और रायपुर जेल में कैद किये गए। सहा महीने तुरुगवास हुवा। जेल में ही महाराज आरती, ध्यान, सामुदायिक प्रार्थना करते थे तुकडोजी महाराज 6 महीने जेल में रहे।

'' गांव है देशाचा नकाशा। 
गवावरून देशाची परीक्षा। '

गांव के सभी भेद ख़त्म होना चाहिए। जातीयवाद, वर्णवाद ख़त्म होकर के शोषणमुक्त गांव होना चाहिए। यह राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज का मुख्य उद्देश्य था।

गरीब श्रीमंताचा वाद। 
गावास करील बरबाद। 

गांव में मानवता का धर्म रहना चाहिए। श्रमिक संस्कृति गांव में निर्माण किया। 

'' परधर्म मुझे इसलिए न बुरे लगते है 
ये सभी अपने प्रभु का रूप निखारते है 
मेरी नजर इसलिए मैंने उची पाया 
अब विश्व को अपने दिल में मान भाई। ''

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने गोवा में बायबल और गीता के विषय पर भाषण किए थे और उन्होंने ख्रिश्चन को भी प्रभावित किए। उसके बाद मानवतावाद, मानवी कल्याण और समानता के बारे में बताया। 

'' मिलता हूँ मै सब धर्मवालोंसे। मेरा दिल साफ है 
मै जनता हूँ की प्रभु सबका। करे इंसाफ है 

झूठ न हो कोई प्रचारक, धर्म निंदा जो करे 
सबको सिखाना प्रेम निर्मल। सत्यकी सेवा करे। '

 राष्ट्रसंत ने पुरे जगत के लिए काम किए, लेकिन ग्राम को वे भूले नहीं। ग्राम यह उनके लिए बहुत महत्व पूर्ण घटक है, '' ग्रामसेवा यह सच्ची सेवा है और देश सेवा भी है, 

महाराज जी को कॅन्सर था उन्हें इलाज के लिए मुंबई लेके गए उनकी तबियत अच्छी होनी चाहिए इसलिय अखिल मानव समाज ने सामूहिक प्राथना किए, मृत्युंजय का जप किय उन्हें मिलने के लिए स्वामी सीताराम महाराज, सरसंचालक गोपालकर सर आए थे। उस समय उन्हें मुंबई से मोझरी को लाया गया, महाराज की तबियत बिगड़ती गई, लेकिन उनके मन में किसानों की चिंता बैचेन कर रही थी। 

राष्ट्रसंत तुकडोजी महारज ने दि. 11 अक्टूबर 1968 में समाधी लिए। 

'' आवो सब मिल जायेगे प्रभु ध्यान धरेंगे। 
सबका भला करो। यह आवाज धरेंगे। ''
   
यह सन्देश अखिल मानवता को देकर के गए और आज भी ग्राम विकास के कार्य चालू है और हमेशा चालू रहेंगे।  
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 थॉमस एडिसन अनुसंधान कर्ता

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