स्वामी दयानंद सरस्वती / Swami Dayanand Saraswati


Swami dyanand sarswati

परिचय 


नाम :- मूलशंकर अंबाशंकर तिवारी

जन्म :- इ.स 1824

जन्मस्थान :- टंकारा (मोरवी संस्थान, गुजरात )

पिताजी :- अंबाशंकर

माताजी :- अमृतबाई

शिक्षा :- स्कुल नहीं पढ़े

शादी  :- शादी नहीं किया


स्वामी दयानंद सरस्वती के कार्य / Works of Swami Dayanand Saraswati

➤ जीवन को बदलदेनेवाली घटनाएँ / Life-changing events

 

शिवरात्रि का दिन था। पिताजी बोले '' मूलशंकर , आज सभी को उपवास करना है। रात में मंदिर में जाना है,और शंकर के पिंडी की पूजा करनी है, यह सुनकर मूलशंकर ने उपवास किया। दिन ढलते गया और रात हो गई, मूलशंकर और उसके पिताजी शंकर के मंदिर में गए उन्होंने पूजा की, पिंडी पर फूल चढ़ाए। चावल के अक्षता चढ़ाए और रात के बारा बजे उसके पिताजी को नींद लगी। लेकिन मूलशंकर सोये नहीं क्योंकि मैं सो गया तो मेरा उपवास व्यर्थ जाएगा और सोया नहीं। मंदिर में एक चूहा आया और चावल खाने बैठा तभी मूलशंकर को लगा की मूर्ति अपनी रक्षा नहीं कर सकती तो भक्तो की रक्षा कैसे करेगी। इस कारण उसका मूर्ति पूजा से उसका विश्वास उठ गया। भगवान का सही रूप और धर्म के बारे में जानने की जिज्ञासा जागृत हुई। 

मूलशंकर की चौदा साल की बहन का कॉलरा के बिमारिसे मृत्यु हो गया। उसके बाद मूलशंकर के चाचा का कॉलरसे मृत्यु हुवा। इस कारन मूलशंकर दुखी हुए।  

➤ गृहत्याग / Homelessness

अपने अपरिवार का त्याग करना चाहिए ऐसा मूलशंकर को लगता था। जीवन क्या है ? मृत्यु क्या है ? इसके बारे किसी महात्मा से पूछना चाहिए ऐसा मूलशंकर को लगता था। यह सारी बातें जानने के लिए मूलशंकर ने उम्र के 21 वे साल में अपना घर-दार सोड दीया। भौतिक सुख लेने के बजाय आध्यात्मीक उन्नति करना उन्हें अच्छा लगा इसलिय घरदार का त्याग करके गुरु की खोज करने के लिए निकला। 

गुरु की खोज / Master's search

गृहत्याग करने के बाद मूलशंकर अहमदाबाद, बड़ोदरा, हरिद्वार, कशी, कानपूर यहाँ पर मूलशंकर गया था। और उस समय के पंडित और सन्यासी स्वामी पूर्णानंद इनके साथ मुलाखत हुई। और मूलशंकर स्वामी पूर्णानंद महाराज के शिष्य बने। और सन्यासी का धर्म स्वीकार किया। सन्यास धर्म का स्वीकार करने के बाद मूलशंकर ने स्वामी दयानंद सरस्वती नाम धारण किए। 

पंधरा साल तक घूमने के बाद स्वामी पूर्णशर्मा नामक साधु के कहने पर स्वामी दयानंद मथुरा पहुचे।  मथुरा में स्वामी विरजानंद के शिष्य बने और वेद व इतर हिंदू धर्म का ज्ञान लिया।



वैदिक ज्ञान का प्रचार / Promoting Vedic Knowledge

स्वामी दयानंद को वेद सर्वश्रेष्ठ और पवित्र लगते थे। वेद की एक खास बात याने की वेद में मूर्तिपूजा नहीं थी। और उच्च-नीच का भाव नहीं था। वेद का ज्ञान सच्चा ईश्वरीय ज्ञान है। पवित्र ज्ञान है। समाज के लिए बहुत ही अच्छा ज्ञान है। वेद पर उनकी श्रद्धा थी। इसलिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा ,'' वेदाकड़े  परत जा '' ऐसी शिक्षा भारतियों को दी।

इ.स 1869  

कशी के सनातनी ब्रह्मण पंडित से शास्त्र के विषय पर वादविवाद किया था इसलिय उनका नाम विश्व में अमर हुवा है।


स्वातंत्रप्रेम/Freedom love 

इ.स 1857 के असफलता से कोंग्रस के स्थापना तक भातियों के हृदय में स्वतंत्रप्रेम जागृत करने के कार्य जिस -जिस महापुरुष ने किया उसमे से एक याने की दयानंद सरस्वति थे।  भारत से ब्रिटिशों को भगाने के लिए सशस्त्र क्रांति यह मार्ग अच्छा है। आर्यसमाज और गुरुकुल में राष्ट्रभक्त को सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरणा और प्रशिक्षण दिया जाता था। स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लजपतराय और लाला हरदयाल इ. ब्रिटश को भारत से भगानेवाले नेता आर्यसमाज के थे।

आर्य समाज की स्थापना /  Establishment of Arya Samaj 

स्वामी दयानंद सरस्वती ने धर्म सुधारने के कार्य की प्रेरणा ब्रह्मो समाज से लिया था। और मुंबई में 10 एप्रिल 1875 में आर्य समाज की स्थापना हुई।

आर्य समाज ने धार्मिक और सामाजिक सुधारना के साथ-साथ शैक्षणिक सुधारना किए। वेद की पढ़ाई ग्रहण करनेवाला बालक निर्भय, तेजस्वी और बहुत बड़े-बड़े आव्हान से मुकाबला करनेवाला ऐसा दयानंद को लगता था। आर्य समाज ने लाहोर में दयानंद अग्लोवैदिक कॉलेज चालू किए। और '' गुरुकुल '' संस्था की स्थापना किए। राष्ट्रीय शिक्षण देनेवाली स्कुल और महाविद्यालय देश में बहुत जगह पर स्थापन किए।



स्वामी दयानंद सरस्वती के विचार / Swami Dayanand Saraswati's views

➤ सभी मानव एक है, सभी का धर्म एक, पृथ्वी माता एक यह जीवन की चतुःसुत्रू है।

➤ स्त्रीको शिक्षा देना चाहिए उन्ही अज्ञान में रखा जाता है, यह भारत के अंधपतन का कारन है। जिस प्रकार किसी कपडे में लपेटा हुवा रत्न की परछाई आइने में दिखाई नहीं देती, ठीक इसी तरह पडदा पद्धत , रूढ़ि , परंपरा चालू है तो स्त्री की प्रगति नहीं हो सकती है।

➤ स्त्री को समाज में सन्मान का स्थान मिलना चाहिए। स्त्री परिवार की स्वामिनी रहती है इसलिए उसे अधिकार मिलना चाहिए।

ग्रंथसम्पदा / Scripture  

'' सत्यार्थ प्रकाश '' यह महान ग्रंथ याने की स्वामी दयानंद ने अपने समाज को दि हुई अनमोल देणगी है। इस ग्रंथ में पंधरा अध्याय है और उसमे वेद का सत्यार्थ दिया हुवा है। इसलिए इस ग्रंथ को '' सत्यार्थ प्रकाश '' कहते   है। यह ग्रंथ वेद पर आधारित है। 

स्वामी दयानंद सरस्वती का मृत्यु / Swami Dayanand Saraswati dies

इ.स 1883 में स्वामी दयानंद सरस्वती का विषप्रयोग के कारन मृत्यु हुई। 


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