संत गाडगेबाबा का जीवन / Biography of Sant Gadge Baba



saint Gadgebaba



संत गाडगेबाबा एक बार मथुरा के लिए रेलवेगाड़ी में बैठे सभी लोग उनके तरफ देख रहे थे क्यों की उनके हाथ में लाठी थी और गाडका ,उनके कपडे फटे पुराने थे। गाड़गेबाबा भुसावल रेलवे स्टेशन में उतरे और वहा पर दो दिन रूखे आजुबाजु के गांव की साफ़सफ़ाई किए। और रेलवेगाड़ी में बैठे उनके पास टिकिट नहीं थी इसलिए तिकीट कलेक्टर ने निचे उतार दिया। उन्हें पैसे मांगने लगा उनके पास पैसे नहीं थे उन्हें मार खानी पड़ी और गाडगेबाबा चुपचाप स्टेशन पर बैठे थे हमाल लोग आए और बाबा को काम करने के लिए बताया बाबाने हमाली किए और आगे के रेलवेगाडी में बैठे और मथुरा पहुंचे।    

गाडगेबाबा के पूर्वजों की जानकारी 

संत गाडगे बाबा ( डेबूजी ) के पूर्वज मु ;- शेणगाव, ता :- दर्यापुर, जिला :- अमरावती में रहते थे। शेणगाव  में '' जयाची जानोरकर रहते थे वे जात  के परिट थे। वराडी भाषा में '' वट्टी '' कहते है और अपने Civil language में '' धोबी ''कहते है , जयाची जानोरकर के पास खेती थी इसलिय वे खेती करते थे। 

जयाजी जानोरकर को एक लड़का था। उसका नाम था नोगोजी और नागोजी के पत्नी का नाम था बलाबाई इनको तीन लड़के थे, 1) राणोजी, 2)जानोजी, 3) कराजी।

नागोजी का कपडे धोने का धंदा था। नागोजी ने तीनों लड़कों का विवाह कर दिया और कुछ दिनों में नागोजी और बलाबाई का निधन हो गया।

  तिन्हों भाईयों के लिए जमीन का बटवारा हुआ जागोजी के तरफ लड़के बच्चे नहीं थे इसलिय अपनी जमीन अपने भाई राणोजी को दिया। छोटे भाई कराजी ने अपनी खेती करके आर्थिक परिस्थिति अच्छी बनाई। राणोजी बहुत ही मेहनती थे। उसने अपने पिताजी के पद्चिन्हों पर चलते हुए धंदा करते हुए खेती करते हुए खेती भी खरीद लिया। राणोजी और झीप्राबाई का लड़का झिंगराजी है। 

झिंगराजी का विवाह दापुरा के हंबीरराव कोलसकर बहुत बड़े जमीनदार थे उनके पास 56 एकर जमीन थी उनकी छोटी बेटी सखु के साथ में हुआ।

झिंगराजी को उनके काका ने जमीन दी थी उस जमीन को अधे से देकर अपने परिवार का गुजारा करता था। कुछ दिन के बाद में झिंगराजी को दारु का शौक लगा। उनके पास पैसे नहीं रहते थे तो वे सावकर के पास जाकर के पैसे ब्याज से लेते थे और दारू पीते थे झिंगराजी को सावकार का पैसा देने के लिए अपना घर बेचना पड़ा और कर्जा चुकता किया।

झिंगराजी का अँगूठा सावकर ने कागज पर लिया था और रक्क्म को बार-बार  दिखाकर सावकर ने पूरी खेती अपने नाम कर दी।

 झिंगराजी याने की संत गाडगेबाबा के पिताजी है। साथियों दारू के कारण संत गाडगेबाबा के पिताजी ने अपना घर और खेती बेच दी। दारू के कारण उनका परिवार रोड पर आ गया। इसी परिवार में कुछ दिनों के बाद डेबू का जन्म हुआ और डेबू संत गाडगेबाबा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


संत गाडगेबाबा का परिचय      

नाम :- देबू झिंगराजी जानोरकर 

जन्म दिनांक :- 23 फरवरी 1876 

जन्म स्थल :- अंजनगांव सुरजी जिला अमरावती 

पिताजी का नाम :- झिंगराजी 

माताजी का नाम :- सखुबाई 

संत गाडगेबाबा का पारिवारिक जीवन / Family Life of Sant Gadge Baba

संत गाडगेबाबा का जन्म 23 फरवरी 1876 को शिवरात्रि के दिन हुआ है और उनका नाम रखा गया डेबू। 

झिंगराजी की तबियत बहुत ही ख़राब रहती थी। उनके घर में गरीबी थी गरीबी के कारण उनके रिस्तेदार भी नहीं आते थे उनका खुदका भाई याने की गाडगेबाबा का मामा चंद्रभान भी नही आता था। लेकिन भुलेस्वरी नदी के पास रहनेवाले झिंगराजी के मावश भाई ने उन्हें अपने कोतेगाव में बुलाया और कहने लगे भैया आप हमारे घर में हमेशा-हमेशा के लिए रह सकते हो और झिंगराजी अपने मावश भैया के यहा रहने लगा और 1884 में झिंगराजी का निधन हुआ। 

सखुबाई को बहुत दुःख हुआ कोतेगाव में झिंगराजी का अंतिमसंस्कार हुआ। अपने भैया चंद्रभान के पास बहुत जोरजोर से रोने लगी लेकिन उसके भाई ने अपने बहन और भांजा डेबू को अपने गांव दापुरा लेके गया। 

अपने मायके में सखुबाई रहने लगी डेबू भी रहता था डेबू मामा के घर में कामधन्दा करता था, खेत पर जाता था, गैया चराता था। डेबू बड़ा हुआ अपने मामा के घर में मामा के साथ खेती करता था डेबू हल चलाता था। कुछ दिनों के बाद डेबू के मामा चंद्रभान का निधन हुआ और पुरे परिवार की जबाबदारी डेबू को ही संभालना पड़ा। 

डेबू अपने मामा के निधन के बाद खेती का पूरा काम संभालता था। डेबू बहुत मेहनती था। डेबू को भी सावकार फ़साने की कोशिस कर रहा था लेकिन डेबू फसा नहीं और सावकार को अपने जमीन पर कब्ज़ा नहीं करने दिया। 


गाडगेबाबा का गृहत्याग  

गाड़केबाबा के मन में कुछ  विचार चल रहे थे, उन्हें सावकार गफलत से अपने नाम पर जगह करता था इसके लिए कर्जा लेनेवाले किसान को न्याय मिलाकर देना। भक्ति का मार्ग और संत के विचारों से ही भारत देश का उद्धार होगा। इस विचार को घर-घर पहुंचाने के लिए घर से दूर होना चाहिए अपने संसार का त्याग करना चाहिए मोह-माया से दूर रहना चाहिए। डेबूजी को घर से दूर रहने की इच्छा होती थी एक परिवार की सेवा करने के बजाय पुरे विश्व की सेवा करना चाहिए इस तरह के विचार गाडगेबाबा के मन में आते थे। 1904 में गड़गेबाबा का मिलन एक योगीपुरष से हुआ। गाडगेबाबा और योगीपुरष के बिच में क्या बाते हुई यह किसी को भी पता नहीं है। संत गाडगेबाबा उम्र के 29 साल में 1 फरवरी 1905 में गृहत्याग किया। 

पंढरपुर में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज उम्र के 16 साल से आते थे। अपनी खंजरी बजाकर भजन करते थे। गाडगेबाबा ने स्थापित किए धर्मशाला में जाते थे। 04 जुलाई 1930 को गाडगेबाबा का कीर्तन आषाढ़ी एकादशी को पंढरपुर में था बहुत लोग कीर्तन सुनने के लिए आए थे लेकिन गाडगेबाबा के पास पखवाज बजानेवाला आदमी नहीं आया था इसलिए तुकडोजी महाराज आगे आए और पखवाज बजाने लगे और 1930 से दोनों में प्रेम बढ़ता ही गया और राष्ट्रका उद्धार किए।  



गाडगेबाबा के घटित-घटनाएँ / Events of Gadgebaba

गाडगेबाबा पैदल -पैदल चलने लगे जिधर रास्ता जाता था उधर ही गाडगेबाबा जाते थे। एक गांव में शाम हुई और वे हनुमानजी के मंदिर में बैठ गए। 

 डेबूजी का फटा हुआ कुर्ता था, उनके  चेहरे पर थकान रहती थी, एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में गाड़गा लेकर के गांव-गांव जाते थे। उनके तरफ देख कर उन्हें भिखारी कहते थे, लेकिन गाडगेबाबा उस समय मात्र 29 साल के युवा थे इसलिए उन्हें कुछ लोग चोर समझते थे ।एक बार गाडगेबाबा को गांव के लोगों ने चोर समज के रात के समय में गांव के बहार निकाल दिया और गाडगेबाबा एक पेड़ के निचे ही रहे।  

गाडगेबाबा और उनके साथी एक बार खातखेड़ गांव में पहुँचे और उस गांव को सफा किए और रात में मंदिर में कीर्तन करना था इसलिए उजाले के लिए दिया मांगने गए तो उन्हों भगा दिया। 

गाडगेबाबा को अपमानित होना पड़ता था लेकिन उन्हों ने अपने रास्ते पर चलना नहीं छोड़ा, और गांव-गांव जाकर के साफ-सफाई और भजन कीर्तन के माध्यम से समाज जाग्रति करना नहीं छोड़ा, गाडगेबाबा ने 1 फरवरी 1905 को 29 साल की उम्र में गृहत्याग किया और अपने कार्य को पूरा किया, आज उनके कार्य को पुरे विश्व में '' ग्राम स्वछता अभियान '' के नाम से जाना जाता है।

दोस्तों  आपका भी कुछ सपना होगा, उस सपने के लिए उस पद के लिए पढ़ाई कीजिए, एक दिन जरूर पूरा होगा। 


संत गाडगे बाबा का सन्देश जनहित के लिए / Saint Gadge Baba's message



जनता के लिए संदेश 

भूके को  - भोजन दो 

प्यासे को - पानी पिलाओ 

तनपर ढकने को - कपडा दो 

बेघर को - घर दो 

लड़का-लड़की को - शिक्षण दो 

अंध पंगु रोगी को - दवाई दो 

पशु-पक्षी को - अभय दो 

दुखी और निराश लोगो को - हिम्मत दो


दीपावली सन्देश 

दीपावली के दिन बेसन का खाना खाओ, पुराने कपडे को प्रेस करके पहनो , फटाके मत जलाओ, लेकिन कर्जा कर के कर्ज में मत डुबो। 

कर्जा का संदेश 

कर्जा करके शादी मत करो, कर्जा करके मकान मत बाँधों , कर्जा करके तीर्थयात्रा मत करो। 

दया और सेवा का संदेश 

दया और सेवा यही सबसे बढ़ा धन संतों के पास रहता है। यही धन हमें लेना है और जनता की सेवा करना चाहिए। 

मानव समाज के लिए सन्देश 

करनी करेगा तो नर का नरायन बन जाएगा इस मणि के तरह संत के विचार अपने मन में अवतरित करो और नारायण बन जाओ 

शिक्षित को सन्देश 

शिक्षण यह लोगसेवा करने का साधन है। पढ़े लिखे लोगों ने जनता की सेवा करनी चाहिए । 

कार्य कर्ताओं को सन्देश 

समाज की प्रगति के लिए स्वार्थनिरपेक्ष कार्यकर्ते रहना जरुरी है। उन्हों ने शहर में न रहते हुए गांव में रहना चाहिए। गाव के लोगों की समस्या क्या है, और इस समस्या का निराकरण करना चाहिए। 

अस्थिविसर्जन का संदेश 

घर में बूढ़े का निधन हो गया तो उसे पुराने कपडे में ही लेके जाओ लेकिन नया कपडा मत खरीदो, चौदवी का कार्यक्रम करना है तो साधा भट्टे-आलू की का खाना बनाओ लेकिन कर्जा कर के मीठा खाना मत खिलाओँ।   

संत गाडगे बाबा का निधन 

संत गाडगेबाबा का निधन 20 दिसंबर 1956 को हुआ और उनकी समाधी अमरावती में बनाई गई।मा. किसनसिंह राठोर ने संत गाडगेबाबा समाधी मंदिर के लिए एक एकर जमीन का दान किया।  
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