मेरी जीवनी / My biography


My Biography

मेरे आज को देखकर अपने अतीत को ढूंढ़ता हु। मुझे अपने आप पर हँसी आती है। आज मेरा दिल बहुत खुश है।  इन्सान जो चाहता है वह बन जाता है। लेकिन जिन्दगी से जो माँगोंगे वह मिलता नहीं, लेकिन जो आप के लिए अच्छा होता है वह देता है।  दुनिया खुशी के लिए क्या क्या नहीं करती, लेकिन सारी खुशी अपने ही अन्दर अपनी दुनिया में है। 


मेरा बचपन 

मेरी दुनिया का जन्म, मेरे मम्मी पापा के प्यार से हुआ। लेकिन मेरे जीवन को एक आकार देनेवाले मेरे परिवार, मेरे दोस्त, मेरे रिलेटिव, मेरे
शिक्षक और मेरे समाज का बहुत बड़ा योगदान रहा है। मेरे जन्म ने महाभारत रचा, कृष्ण के पैदा होने से जीतनी ख़ुशी उनके माता पिता के साथ उनके गोकुल वासियों को हुई। उतना दुख उनके मामा कंश को हुआ था। मेरे फेमेली में, पापा कुटुंब प्रमुख थे। मुझे जन्म देनेवाली मेरी माँ, दुसरे वे जिनसे मेरा नाम जुडा (मेरे पापा की पहली बीवी जिनको बच्चे नहीं थे), मेरा एक बड़ा भाई, मेरे से बड़े दो बहने थी. मेरे सभी भाई- बहन पढ़ते थे, सभी मिलके खेती के साथ-साथ गाय - भैसों का व्यापार सम्भालते थे। मेरे पापा के फैमिली में दो छोटे भाई, एक बहन थी और उन सभी के अपने अपने परिवार के साथ वे अलग रहते थे। उनमे से मेरे सबसे छोटे चाचा-चाची जिनको कोई संतान न होने से मुझे गोद्पुत्र के रूप में सौप दिया गया। मै लगभग ३-४ वर्ष का रहा होंगा माँ का दूध पीना भी नहीं छोड़ा था। तभी से मेरा लालन-पालन और शिक्षा मेरे चाचा-चाची ने किया। लेकिन इस फैसले से आपसी गैर समज और मेरी कुछ ख़ास विशिष्ट जीवनशैली व हरकतों से मै सभी का आकर्षण का केंद्र बना और मुझे पाने के लिए मेरे दुसरे चाचा ने भी अपना हक़ जताया। पुरे परिवार में एक संघर्ष पूर्ण वातावरण पैदा हुआ।जो लगभग 8 -10 वर्षो तक रहा। इस बिच मेरे चाची जिसे मै आई (माँ) कहता था, ना उसने मुझे जन्म दिया फिर भी यशोदा का कान्हा बना। काफी उनकी निंदा, उपहास,आलोचना होने पर भी उसने मेरे प्रति प्यार और मेरे लालन - पालन में कोई कमी नहीं की उनकी सहेलिया मुझे कान्हा ही बुलाते थे। 



कुछ लोग मुलुर कहके फुकारते थे। दोस्त नाम से बुलाते थे। दोस्तों के साथ खेलना, मिटटी के घर बनाना, मुर्तिया बनाना, उनकी पूजा करना, कार्तिक महा में पूर्णिमा तक शनिवार को व्रत रखा करता था। ज्यादातर मेरे फेमेली मासाहारी थे। लेकिन मेरी आई शाकाहारी व धार्मिक, मिलनसार, नेतृत्व करनेवाली चाहे वह घर , परिवार, रिश्तेदार, या समाज हो। लिखी पढ़ी नहीं थी,फिर भी शादीयो में सहेलियों के साथ गोंडी पाटांग (आदिवासी गीत) गाया करते थे। उनसे काफी सलाह ली जाती थी। बचपन में उतना कुछ समझ में नहीं आया लेकिन आई के प्रति लगाव अधिक रहा। आज भी जब मै अकेला होता हु आई के याद आने पर आखो से आसू निकलते है। जो कुछ हु उनकी प्रेरणा व आशीर्वाद है। 

 शिक्षण  

थोडा बड़ा होने पर बालवाडी गया, मेरा प्राथमिक शिक्षण गाव के स्कुल में ही पूरा हुआ। आगे की शिक्षा मेरे कजिन(मामा का लड़का) के साथ में ही माध्यमिक स्तर तक गाव में ही पुरे किये। दोस्तों के साथ गिल्ली डंडा ,कब्बडी, खो-खो, क्रिकेट, तासपत्ती, शतरंज, खेती के काम के साथ-साथ जानवरों को चराने का भी काम करना पड़ा। विशेषरूप में पढाई के समय किताबो के पाठ हो या कविताये को फ़िल्मी गाने के तर्ज पर पढ़ा करता था। स्कुल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में भी सहभाग लिया करते था  मेरे शिक्षोकों का जो आत्म समर्पण था हमारे लिए वह आज के शिक्षोकों में नजर नहीं आता है। मेरा अपने दोस्तों के साथ सामाजिक
कार्यकर्मो में भी जुडकर काम करना अच्छा लगता था। मराठी में एक मन है। '' लहान पन देगा देवा ,मुंगी साखरीचा रवा ''  बालपन की दुनिया ईश्वर की अनुभूति कराता है। प्यार करना, जिद्द करना, लड़ना -झगड़ना, सीखना, खेलना-कूदना, टी.वी. देखने काफी दूर तक जाना, छोटे चाचा (जिसे मै दादा बोलता था) वे मजदूरी करते थे साथ में वे ढोलक मास्टर थे वे मेरे से आला-उदल, पिंजरे का तोता, रामायण, महाभारत जैसे किताबो को पढ़ कर सुनाने के लिए कहते थे और मै सुनाता था। उसके बदले मुझे कुछ नया खाने को दिया जाता था। उनके मित्र मेरी काफी प्रसंशा भी करते थे। दादा मुझे वकील के रूप में देखना चाहते थे। नियति को शायद यह मंजूर नहीं था काफी समय से वे दमा के शिकार थे अचानक एक दिन वे चल बसे। आई और मै दोनों बेसहरा एकदम अकेले से महसूस करने लगे। लोगो ने आकर बहुत हिम्मत देने की कोशिस करने लगे। 

आई मेरी शिक्षा के लिए काफी चिंचित थी। लेकिन मै ने भी हिम्मत जुटाई आगे की पढाई के लिए काम करना ठाना  उस समय जो मिला वह किया।  खेती के काम मजदूरी गाव की स्कुल पूरी होने के बाद मुझे होस्टल पर रखने के लिए बात चल रही थी तब मेरे बड़े भाई साहब ने मना किया। उनका इरादा मुझे अपनों नजरो के सामने देखना चाहते थे।आई अकेली हो जायेगी उनका मन नहीं लगेगा क्योकि मेरे अलावा उनका कोई नहीं था। यही कारणों से उन्होंने घरपर आये शिक्षको को साफ मना कर दिया। आई के मायके में जाकर गर्मी के छुटियो को बिताते थे वहा आई कुछ काम कर लेती और मुझे कुछ नए कपडे मिल जाते थे। वहा सभी मुझे प्यार करते थे। काफी उम्मीदे मुझसे रखते थे। मै पढ़ लिख कर बढ़ा बनकर गरीबी से दबे कुचले लोगो की मदत करूँगा। यह सपना संजोये दिल में ही ठान लिया था।लगभग मेरी उम्र १२ वर्ष की थी.......

आगे की कहानी आपको बताई जायेगी..... TO BE CONTINUE
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About pravin Bagde

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