महानायक वीर बिरसा मुंडा / The hero Veer Birsa Munda


The Hero Veer Birsa Munda

आदिवासी समाज यह भारत का मूल समाज है।  प्राचीन काल से आदिवासी का राज था। यह आदिवासी राजाओं के वंशावली व हडप्पा और मोहन जोदड़ो के उत्खनन में मिले अवशेष से पता चलता है। गोंडी भाषा के शिलालेख आज भी मौजूद है। हमें पता है की, भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में अनेक क्रान्तिकारीयों  ने अपने प्राणों की आहुति अपने देश व अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अर्पण किये है। लेकिन इतिहास में आदिवासीयो की सहादत को, गोंडवाना साम्राज्य के गौरव शाली इतिहास की जानकारी को नगण्य दिखाया जाता है। 


आज का युवा आदिवासी अपने अतीत से अपने सहिदो को शत शत नमन करता है। गोंडवाना सम्राट शंकरशाहा-रघुनाथ शाहा पिता –पुत्र दोन्हो को अंग्रेजो द्वारा कूटनीति से पकड़ कर तोफो से उड़ाया गया। वीरांगना महारानी दुर्गावती मडावी गोंड राजवंश को बचाने मुगलों से लड़ी , खुद मिट गई लेकिन अपने चरित्र पर दाग लगने नहीं दिया वीर बापूराव शेडमाके ,ऐसे अनेको आदिवासी क्रन्तिकारी महानायकों में जननायक वीर बिरसा मुंडा, जिनको विश्वरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर , राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में प्रेरणा के स्थान पर रखा। आज बिरसा गाव से लेकर शहर तक '' नेशनल हीरो '' बन चूका है। 

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बिरसा मुंडा की वंशावली की जानकारी / Birsa Munda's genealogy information

The hero veer Birsa Munda

जन्म व जीवनपरिचय / Birth and life identity


बिरसा का जन्म 15 नव्हंबर 1875 में बिहार के राँची जिल्हे ( वर्तमान में झारखंड राज्य) के उलीहातू गाव में हुआ। पिता - सुगना मुंडा , माँ - करमी हातु के कोख से जन्म लिए। परिवार में दो भाई , दो बहन के साथ परिवार साधारण कृषि से जीवन व्यापन करते थे। बिरसा बच्चपन से ही बहुत हुशार , तेजश्वी , शांत , आज्ञा धारक , शिष्ट प्रिय थे। शिक्षा में भी काफी रूचि थी। उनका प्रारंभिक  शिक्षा  सलगा गाव में हुआ। बाद में उनका प्राथमिक शिक्षा  मिशन स्कुल से पूरा हुआ। कुछ समय वह मौसी के साथ रहकर खटंगा से शिक्षा लिया। लेकिन अधिकतर समय वह मौसे के क्रूर व्यवहार से रह न सका उन्हें वहा रह कर गाय - बकरी चराना पड़ता था।  एकबार उनकी एक बकरी को जंगल प्राणी ने मार दिया। इस कारण उनके मौसे ने उन्हेंकुछ ज्यादा मारपिट की, इससे माँ –बाप की उन्हें बहुत याद् आई ,वह मध्यरात्रि को ही अपने गाव आ गया। परिवार वालो को उनकी हक्कीकत , मालूम पढने पर बुरा लगा , वह बहुत रोया था।बिरसा के आगे की शिक्षा जी.ई.एल. मिडिल स्कुल चाईबासा से पूरा हुआ।  कुछ समय उनका बंदगाव में रहना हुआ। वही पर रहते हुए हिरा बाई एक लड़की से उनका विवाह हुआ। दुर्भाग्य से हिराबाई अधिक समय जी न सकी उनका निधन होने पर सोली नामक एक लड़की के साथ उनका विवाह हुआ। 




शिक्षाके अतिरिक्त उनकी रूचि व छंद / His interest and verses in addition to education 


 शिक्षा के साथ साथ बिरसा का मिटटी में खेलना , बाँसुरी बजाना , तुमड़ी बजाना , लोकगीत सुनकर अपने आदिवासी संस्कृति , अपने पूर्वजो के बारे में जाना , अपने हितो की परख , अपने समाज की दसा को समझने लगे।  बिरसा की क्रियाशीलता उनकी शारीरिक , मानसिक , बौधिक विचार से  अपने लोगो के बिच एक अच्छी नेतृत्व करनेवाली छवि बनाया था। पढ़ते-पढ़ते ही अपने  गुलामी का एहसास हुआ। बिरसा को ख्रिश्चन मिशनरी के चलाये जा रहे धर्मांतरण का प्रोपोगंडा उन्हें विचलित कर रहा था।  

कारणवश मिशन स्कुल उन्हें त्यागना पढ़ा। आदिवासी समाज निसर्ग के सानिध्य में रहकर पला-फुला है आजादी के साथ जिया है , यही एक गुण एक विचार क्रांति को जन्म दिया। 

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सामाजिक परस्तिथि ही क्रांतिकारक तत्व का निर्माण करती है / Social circumstance creates a revolutionary element

ऐसे ही अनेक कलाओं में निपूर्ण रहते हुए भी तत्कालीन सामजिक व राजकीय परस्तिथीयों ने बिरसा को क्रन्तिकारी बनाया। बिरसा को हमेशा लगता था की अपना समाज अपने विचारो अपने आदि धर्म व निसर्ग पूजक रहा है और अपने संस्कृति का जतन से खुश है ,लेकीन परकीय मिशनरी वाले अपने समाज पर धर्म का चोला जबरदस्ती से पहना रहे है और अपनी संस्कृति थोप रहे है।आदिवासी यह अपने जमींन का खुद मालक है फिर भी उनके जमींन पर महाजन , जमींदार , मालगुजार जैसे लोग अपना कब्ज़ा जमाये रखे है। बिरसा को लगने लगता था की आदिवासी की जमीनों पर कब्जा मतलब माँ से बेटे को अलग रखने बराबर है। जिनके कारण समाज कई जुल्मो का शिकार हो रहा है। जुल्मो के कई शर्तो के निचे दबा पढ़ा है। इन् कारणों के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार भी जवाब दार है। अपना समाज का आत्म सम्मान खतरे में है। समाज की एकता संघटित नहीं है इनका आत्म विश्वाश कमजोर हो चूका है। यदि यह जागृत नहीं हुए तो अपने बहु बेटी की इज्जत भी ना बचा पाएंगे। इनका भविष्य अंधकारमय हो जायेगा। पने लोगो को पहल करना जरुरी है यही विचारो से अपने समाज से चर्चा करने लगे। 




बिरसा द्वारा समाज का नेतृत्व / Leadership of society by Birsa

 बरसो से हो रहे सतत अन्याय , अत्याचार , आर्थिक व शारीरिक शोषण के खिलाप आदिवासी समाज में आत्मविश्वाश की चिंगारी जलाई। सन1869 के वन सरंक्षण कायदा से आदिवासी को जीवन व्यापन करना मुस्कील हुआ था। ब्रिटिश सरकार से मिलनेवाली यातनाओ के विरुद बिरसा के नेतृत्व 1890 में बिरसा ने कुल्हाड़ी से हाथ काटकर और अपने खून से सभी संघटन कार्यकर्ता को तिलक लगा कर शपत दिलाया था।   जन, जल , जमीन, अपनी है इस पर हमारा हक़ है ,इसे कोई छीन नहीं सकता। हमारी लड़ाई मानवीय हक्को की है , अंधश्रद्ध्हा से बहार आओ .हम्हे , ईश्वर बचाने नहीं आनेवाला ,  निसर्ग हमारी शक्ति है . और अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह का उलगुलान बोल दिया। 

10 अक्टुंबर 1895 तगाड पोलिश स्टेशन के रिपोर्ट द्वारा बिरसा से भयभीत की चर्चा होने लगी। ''तामर '' पोलिश स्टेशन के सबइन्सपेक्टर ने जिल्हा अधिकारी को कार्यवाही के लिए रिपोर्ट दिया था। बिरसा को पकड़ने का आदेश जारी किया गया। 

09 अगस्त 1895 को कुछ साथियों के साथ पकडे गए। लेकिन सोली बिरसा की पत्नी द्वारा पोलिश स्टेशन को नेस्तनाबुत करने पर फिर से बिरसा अपने आन्दोलन को जारी रखा था। यह सामाजिक आन्दोलन की सुरुवात थी ,स्वतंत्रता की पहली घोषणा थी.

1897 सेवा दल व जंगल राज की स्थापना की। 07 जनवरी 1900 डोम्वारी हत्याकांड अपने ही गुप्तचर की गद्धारी से हुआ था। जो एक निंदनीय कृत था। अंत में 3 फेब्रु. 1900 को आत्म समर्पण करना पढ़ा। बिरसा के स्वराज के स्वप्न को  राजद्रोह आरोप लगाया गया। बिरसा जाती के लिए नहीं बल्कि पुरे मानव जाती के मानवीय हक्क , स्वतंत्रता की लढाई लड़ी थी। 
09 जून 1900 को राची कारागार में एक महान क्रांति वीर बिरसा मुंडा शहीद हो गए। 

अधिक जानकारी :

➤ बिरसा मुंडा जयंती -15 नोहंबर 

➤बिरसा मुंडा का समाधी स्थल - '' कोकार ''

➤ '' बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार ''

➤ '' बिरसा मुंडा एरपोर्ट राची '' 
      
 प्रा.सुरेश कुंभरे (लेखक)


    
                                                                        






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