चंद्रशेखर आझाद की गौरव गाथा | Chandrashekhar Azad's Gaurav Gatha


चंद्रशेखर आझाद स्वतंत्रता संग्राम के स्वतंत्रता सैनानी थे। 1922 को गांधीजीद्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन एक साथ बंद हुआ और चंद्रशेखर आझाद के मन में क्रांति की ज्वाला भड़कने लगी। वे हिन्दुस्थान रिपब्लिकन असोसिएसन के सदस्य बने। संस्था से जुड़ने से उन्होंने रामप्रसाद बिस्मिला के साथ 09 अगस्त 1925 को काकोरी कांड किये और फरार हुए। 1927 में बिस्मिला रामप्रसाद के साथ 4 प्रमुख क्रांतिकारि शहीद हुए। इस घटना के बाद उन्होंने  उत्तर भारत के क्रांतिकारी पार्टियों को एक जुट करके हिन्दुस्थान '' सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएसन '' का निर्माण किया। भगतसिंग के साथ लाहौर में लाला लजपतराय के मौत का बदला साण्डर्स की हत्या, दिल्ली असेम्ब्ली में बॉम्बस्फोट आदि के लिए आखरी साँस तक लड़े।  

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चंद्रशेखर आझाद की गौरव गाथा | Chandrashekhar Azad's Gaurav Gatha


चंद्रशेखर आझाद का परिचय | Introduction to Chandrasekhar Azad 

नाम :चंद्रशेखर तिवारी
जन्म दिनांक : 23 जुलाई 1906
जन्म स्थल : भाबरा
पिताजी का नाम :सिताराम तिवारी
माताजी का नाम : जगरानिदेवी

चंद्रशेखर सिताराम तिवारी का जन्म 23 जुलाई 1906 को हुआ। उम्र के 13 वे साल में घर छोड़ के मुंबई आये। एक वर्ष नौकरी किये और बनारस चले गए। बनारस में वे असहकार आंदोलन में नेतृत्व करने लगे आंदोलन में  गिरफ्तार हुए  उन्हें मजिस्टेट के आगे खड़ा किया गया और नाम पूछने लगे तभी उन्होंने अपना नाम :- चंद्रशेखर, पिताजी का नाम :- स्वाधिनता और अंतिम नाम (सरनेम) :- आझाद बताया तभी से उन्हें चंद्रशेखर आझाद के नाम से पहचानते है।


क्रांतिकारी घटना की जानकारी | Revolutionary event information

1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड से देश के सभी नवयुवकों के मन में बदला लेने की और देश प्रेम की भावना जागृत हुई। चंद्रशेखर आझाद उस समय पढ़ाई कर रहे थे। गांधीजी ने असहयोग आंदोलन चालू किया और भारतवासी स्वतंत्रता के संग्राम में सहभागी होने लगे। स्कुल के छात्रों ने भी भाग लिया वे भी सड़कों पर निकल पड़े ठीक उसी तरह चंद्रशेखर आझाद भी एक छात्र ही थे उनकी उम्र 15 साल की थी उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया और उन्हें 15 बेतों की सजा हुई।


पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस घटना का वर्णन कानून तोड़नेवाले छोटे से बच्चे के रूप में किया है। ......

'' कानून तोड़नेवाले 15 साल के बच्चे को बाँध कर उसे बेत से मारा जा रहा था। जैसे ही बेत मारते थे वैसे ही '' भारत माता की जय '' का नारा लगाता था। उसकी चमड़ी निकलती थी और वह लड़का बेहोश हुआ। अपने आपको आजाद समझता था और एक दिन वही लड़का क्रांतिकारी दल का नेता बना।

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झांसी | Jhansi

चंद्रशेखर आझाद ने कुछ समय के लिए झांसी में अपना कॉटर बनाया। झांसी से 16 किलोमीटर दुरी पर ओरछा के जंगलों में अपने साथियों के साथ निशानेबाजी करते थे। निशानेबाज होने के कारण वे दूसरे क्रांतिकारियों को बताते थे और पंडित हरिशंकर ब्रम्हचारी के छ्द्म नाम से बच्चों को पढ़ाते थे।   


क्रांतिकारी संघठन | Revolutionary organization

1922 के चौरी चौरा कांड के बाद गांधीजी ने किसी से पुछे बिना आंदोलन वापस ले लिया सभी क्रांतिकारी नाराज हुए। 1924 में उत्तर भारत के क्रांतिकारियों ने '' हिंदुस्थानी प्रजातान्त्रिक संघ '' का निर्माण किए। इस संघ में चंद्रशेखर आझाद भी सामिल हुए। दल के लिए पैसा इक्कठा करने के लिए गांव में घुसकर के चोरी करने लगे लेकिन सभी के लिए एक ही नियम था की चोरी करते समय कोई भी क्रांतिकारी किसी भी महिला को कुछ नहीं बोलेगा। गांव में एक महिला ने चंद्रशेखर आझाद की पिस्तौल पकड़ा लेकिन किसी ने कुछ नहीं बोले, क्रांतिकारियों पर सभी गांववालों ने हमला किया और वहा से क्रांतिकारी भाग निकले। आज के बाद हम सरकारी खजाना ही लूटेंगे गांव में छापे नहीं मारेंगे ऎसा क्रांतिकारियों का निर्णय हुआ। 

दल के साथ 09 अगस्त 1925 में काकोरी घटना को अंजाम दिया। योजना के बारे में चर्चा करने के लिए मीटिंग का आयोजन किया गया था तभी असफाक उल्ला खान ने इसका विरोध किया क्यों की, ब्रिटिश सरकार दल को तोड़ देंगे और वैसा ही हुआ। काकोरी घटना के क्रांतिकारी - चंद्रशेखर आझाद, पंडित रामप्रसाद बिस्मिला, असफाक उल्ला खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी आदि क्रांतिकारियों में से चंद्रशेखर आझाद फरार हुए वे ब्रिटिश सरकार के हाथ नहीं लगे बाकि के पंडित रामप्रसाद बिस्मिल्ला, असफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह आदि 3 क्रांतिकारियों को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार करके दिनांक 19 दिसंबर 1927 को फासी दी। उसके दो दिन पूर्व दिनांक 17 दिसंबर 1927 को राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को गिरफ्तार करके फ़ासी दी गई।  

इस घटना के बाद चंद्रशेखर आझाद ने उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारियों को सभा के लिए 08 सितंबर 1928 को दिल्ली के फ़िरोज़ शाह कोटला मैदान में बुलाया। दल का प्रचार प्रमुख भगतसिंह को बनाया गया। चंद्रशेखर आझाद सेना प्रमुख बने और "Hindustan Republican Association" का नाम बदल कर "Hindustan Socialist Republican Association" रखा गया इस दल का एक ही जयघोष था '' हमारी लडाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और यह फैसला है, जित या मौत। '' 


लाला लाजपतराय के मौत का बदला | Revenge of Lala Lajpatrai's death

लाला जी का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को लाहौर के पुलिस स्टेशन के आजु बाजु में क्रांतिकारी छुपे थे जैसे ही पुलिस स्टेशन से जे.पि साण्डर्स निकले वैसे ही राजगुरु ने उनके मस्तक पर गोली मरी वो निचे गिरा उसके बाद भगतसिंग ने गोली मरी और उसे मौत के घाट उतरा उसके अंगरक्षक ने चंद्रशेखर आझाद का पीछा किया लेकिन चंद्रशेखर आझाद ने उसे गोली मारके मौत के घाट उतरा। इस तरह से लालजी के मौत का बदला क्रांतिकारियों ने लिया। 

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केंद्रीय असेंबली में बॉम्ब स्फोट | Bomb blasts in central assembly

चंद्रशेखर आझाद के सफल नेतृत्व में ही भगतसिंग और राजगुरुने 08 अप्रैल 1929 को दिल्ली के केंद्रीय असेंबली में बम ब्लास्ट किए लेकिन इस बम ब्लास्ट का उद्देश किसी की जान लेना नहीं था तो अंग्रेज सरकार के गैर क़ानूनी नियम के विरुद्ध में था। ब्लास्ट होने के बाद भगतसिंग और बटुकेश्वर दत्त ने अपने आप को पुलिस के हवाले किया। साण्डर्स के खून का आरोप और असेंबली ब्लास्ट के आरोपियों को पुलिस ने अपने हिरासत में लिया और फांसी की सजा सुनाई। 

तीनों क्रांतिकारियों ने अपील की और 11 फरवरी 1931 को लन्दन के प्रिवी कौंसिल में अपील की सुनवाई हुई। क्रांतिकारियों के वकील प्रिंस ने बहस की अनुमति मागि लेकिन बहस होने के पहले अपील ख़ारिज की गई। तीनों क्रांतिकारियों को बचने के लिए चंद्रशेखर आझाद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले उनके नुसार वे पंडित जवाहरलाल नेहरू के निवास्थान आंनद भवन (इलाहाबाद ) में मुलाखत किए। आझाद पंडित नेहरू से बोले की, गाँधीजी लॉर्ड इर्विन से बात करे और तीनों की फ़ासी की सजा उम्र कैद में बदले। लेकिन गाँधीजी अहिंसावादी थे। ऎसा हुवा नहीं और तीनों को फ़ासी की सजा हुई। 

27 फरवरी को अलाहाबाद अल्फ्रेड बाग में अपने क्रांतिकारियों से आगे की योजना बना रहे थे लेकिन वीरभद्र तिवारी के कारण पुलिस बाग में पहुँची और बाग को घेर लिया आझाद को समज में आग या था की अब मुझे पुलिस पकड़ ही लेंगी लेकिन मैं पुलिस को जिन्दा नहीं मिलूँगा यह बात हमेशा उन्हें याद आती थी उन्हों ने पिस्तौल निकाली और  अपने आप को गोली मारी इस तरह से वे 27 फरवरी 1931 को शौर्यशाली आत्मार्पण किए।


  चंद्रशेखर आझाद के शब्द अभी भी कानों में गूँजते है... , 

 '' जबसे सुना है मरने का नाम, जिंदगी है। 
सर से कफ़न बांधे दुश्मन को ढूंढते है। ''

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