भारतिय वैज्ञानिक '' आर्यभट्ट '' | Indian scientist 'Aryabhatta'


 भारत देश ने पुरे विश्व को वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान किया। सफल प्रयोग के ज्ञान के साथ आत्मचिंतन, अनुभव और शब्द का भंडार इस आधार पर प्राचीन काल में भारतीय ऋषिमुनि ने आत्मा परमात्मा आदि का अर्थ स्पष्ट किया।  इस विज्ञान के आधार पर किया गया चिंतन, वेदपुराण और उपनिषद में समाविष्ट किया गया। विज्ञान के आधार पर समाज की निर्मिति करनेवाले वैज्ञानिक कनादमुनि, आर्यभट्ट, जीवक, सुश्रुत, वराहमिहिर, पाराशर, सिद्ध नागार्जुन काश्यप, अगस्ति, भारद्वाज, भास्कराचार्य और बौद्धायन आदि है।

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भारतिय वैज्ञानिक '' आर्यभट्ट ''  | Indian scientist 'Aryabhatta'


भारत देश ने पुरे विश्व को खगोलशास्त्र की पहचान प्राचीन काल में कर के दिया। प्राचीन भारतीय शास्त्रज्ञ प्रयोगात्मक और जानकार थे। आर्यभट्ट ने स्वरसंख्या, वेजनसँख्या का उपयोग करके अंकसंख्या शब्द की भाषा में बताये। ,प्राचीन काल में राजकीय गुप्त संकेत के लिए अंकभाषा उपयुक्त हुई। आर्यभट्ट ने चक्र का परिघ और व्यास का प्रमाण निश्चित किया है और बीजगणित की रचना किया। पृथ्वी की रचना और भारत की खगोल वैज्ञानिक दृष्टी सिद्ध किया।

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आर्यभट्ट की गौरव गाथा  |  Aryabhata's Gaurav Gatha

आर्यभट्ट का जन्म इ.सा. 476 को बिहार के कुसुमपूर ( पाटना ) शहर में हुआ। गुप्त साम्राज्य वैभवशाली था।राज्य ज्योतिशोने राज्य में खग्रास सूर्यग्रहण की स्थिति दर्शाए। उस सभा में आर्यभट्ट बोले पृथ्वी बॉल के जैसे गोल है और सूर्य के सभोवताल घूमती है। आस उत्तर-दक्षिण है। पृथ्वी का आधा भाग सूर्य के तरफ रहता है उसे दिन कहते है और जो भाग सूर्य की तरफ नहीं रहता उसे रात कहते है। पृथ्वी खुद के सभोवताल परीभ्रमण करती है इस कारण दिन-रात होती है। पृथ्वी की परछाया चंद्र पर गिरने से '' चंदग्रहण '' होता है। पृथ्वी और सूर्य के बिच चंद्र आने से '' सूर्यग्रहण '' होता है।

आर्यभट्ट ने कहा है की , चंद्र स्वयप्रकाषित नहीं है सूर्य का प्रकाश स्वरूपित करता है। आर्यभट्ट ने सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन विषय पर संशोधन किया है। आर्यभट्ट के ग्रंथ 2 भागों में है प्रथम भाग दशगोलिका और दूसरा भाग आर्यषटांगत नाम से प्रसिद्ध है।

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◼️आर्यभट्ट ने बीजगणित की रचना और भूमिति के प्रेमय खोज के निकाला वैसेही आर्यसिद्धांत नाम के विज्ञानग्रंथ का निर्माण किया।

◼️अंकगणित, बीजगणित और गोलगनित आदि शाखा का निर्माण ग्रहज्योतिष शास्त्र के कारण हुआ है।

◼️त्रिकोण के sien की संकल्पना आर्यभट्ट ने स्पष्ट किया। 

◼️सूर्यसिद्धांत याने की सभी ग्रह सूर्य के सभोवताल भ्रमण करते है इस सिद्धांत पर आर्यभट्ट ने सूर्य सिद्धांत प्रकाश पर आलोचना की है। आर्यभट्ट के सिद्धांत के नुसार 1 वर्ष याने की 365 दिन, 15 घटी, 39 पळे और 15 विपले इतना समय होता है। 

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◼️ग्रीक अक्षर पाय ( 丌 ) याने की वर्तुळ का परिघ और व्यास का प्रमाण आर्यभट्ट ने चार दशांश स्थल तक प्रयोगसिद्ध किया याने की 3.1416 इतना होता है। 

◼️आर्यभट्ट ने प्रकश के रास्ते में रखे हुए पदार्थ के परछाई का मोजमाप करने की पद्धत विकसित किया और अंकगणित के लिए शब्द पद्धत खोज के निकला। त्रिकोणमिति संकल्पना की रचना करने में आर्यभट्ट का बहुमूल्य योगदान है। 

◼️आर्यभट्ट की याद में आधुनिक भारतीय अवकाश वैज्ञानिकों ने प्रथम भारतीय कृतिम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट दिया। 

◼️प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों में से सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक याने की आर्यभट्ट था। 

 ◼️गुप्त सम्राट विक्रमादित्य के दरबार का महान खगोलशास्त्रज्ञ आर्यभट्ट का निधन इ.सा. 550 में हुआ।     
    
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