बेटी को बेटी कहें | Say daughter to daughter


दोस्तों नमस्कार, मेरा नाम आरती मैं www.pravingyan.com के लिए Article लिखती हु। आज का Artical है , '' बेटी को बेटी कहें ''  जहा बेटी का जिक्र होता है , वहाँ वंदनीय क्रांतिज्योति सावित्रीबाई का नाम आता है। जहा बेटे का नाम आता है , वहाँ जिजाऊ के  ' परस्त्री माता जैसी ' कहने वाले बहुजन प्रतिपालक शिवराय का नाम आता है। एक स्त्री ही एक बेटी और बेटे को अच्छे संस्कार दे सकती है। आज के इस आधुनिक युग में भी बेटी भी बेटे का काम कर सकती है और करती भी है। बेटी घर की लक्ष्मी है। बेटी ससुराल में होती है, तो भी अपने मायके का ख्याल रखती है। बेटी एक मायके और ससुराल की LIC होती  है। आज मैं ऎसे ही बेटी के बारे में बताने जा रही हु।

∎ शहीद भगतसिंग विजय गाथा

∎ लोकमान्य तिलक विजय गाथा

बेटी को बेटी कहें | Say daughter to daughter

अब समय आ गया है की, बेटा-बेटी में कोई भी पक्षपात नहीं करना चाहिए इस सोच को समाज से निकालना है। आज से हम सभी लोग बेटा-बेटी में कोई अंतर नहीं रखेंगे और उन्हें पूरा हक देंगे। हमें अपने सोच, देखने का  नजरिया और हालत को बदलना है। बेटा-बेटी में दूजाभाव न करते हुए एक समान मानते हुये हमें अपने परिवार और देश का भविष्य बनाना है। समय आ गया है की जो लोग दूजाभाव करते है, उन्हें पलटकर जबाब देने का बेटियाँ बेटे के बराबर है। सिर्फ हमें अपनी सोच बदलना है।   

 राजर्षि शाहू महाराज विजय गाथा

▪️ संत गाडगेबाबा की जीवनी 

मैं एक बेटी आपसे बात कर रही हु, क्या मेरी सज्जा, मेरी कमजोरी है ? Is my decoration, my weakness ? क्या मेरे कलाई का कंगन हथकङी बन गई ? (My wrist bracelet is chained ?)  मेरे पैरो की पायल, बेड़िया बन गई ? मेरे सिर की बिंदी ने लाजवंती बना दि (My head bindi made lazwanti) या कानों के कुंडल ने नौकरानी बना दि, चुला चौका करती हु। इसलिए मैं घर के अंदर कैद बनी .... मेरी सुंदरता के सभी प्रतीकों ने मेरी कमजोरी बना दी।

बेटी अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ पूरी करती है। और अपने परिवार को खुश रखती है। तभी माता-पिता को लगता है की, हमारी बेटी ने आज बेटे का काम किया है, मैं कहना चाहती हु की, बेटी को बेटी ही रहने दीजिये उसकी तुलना बेटे से नहीं करना चाहिए क्यों की, बेटे के लिए बेटी को गर्भ में ही मार दिया जाता है। क्या बेटा जो काम करता है वह काम बेटी नहीं कर सकती, जी हाँ कर सकती है। अगर हमारी बेटी परिवार की जिम्मेदारियाँ पूरी करने लगी, सरकारी कर्मचारी बनने लगी तो, तभी माता-पिता बड़े गर्व से कहते है की, मेरे बेटी ने बेटे जैसा काम किया है, लेकिन ऎसी तारीफ करना गलत है '' बेटी को बेटी '' ही रहने दीजिये क्यों की अगर हम बेटी को बेटा कहते है तो '' बेटे की भावना निर्माण '' होती है। जिस घर में बेटियाँ है उन्हें भी लगता है की एक बेटा होना चाहिए। साथियों बेटी को हम माता-पिता समाज में कमजोर करते है, बेटा कहके। आज बेटी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, पुलिस, पायलट आदि बन सकती है। समाज और माता-पिता ने अपनी सोच को बदल के बेटी को बचाके पढ़ाना चाहिए। क्यों की समाज, घरपरिवार में बेटे के लिए पक्षपात होता है। जिस घर में बेटियाँ है उस घर में, सास को नाती चाहिए। लेकिन नातन आ जाती है। इस कारण सास बहुँ में पक्षपात होता है। CID, क्राइम पेट्रोल, न्यूजपेपर आदि में कुछ घटनाये देखते है, पढ़ते भी है की, गर्भ में ही इस नन्ही बेटी को मार दिया जाता है ऎसा नहीं होना चाहिए इसलिए हमें '' बेटी '' को ही आगे बढ़ाना है। इसका मतलब यह नहीं की, बेटे को पीछे रखना है।

▪️ दादाभाई नौरोजी की जीवनी
▪️ राजा राममोहन रॉय की जीवनी 



हम बेटे को ज्यादा अहमियत क्यों देते है ? | Why do we give more importance to son

  • हमारे हिन्दुस्थान में एक पारम्परिक सोच बनी है की, परिवार में बेटो को घर का प्रमुख मानते है और परिवार की सारि जिम्मेदारी पूरी करता है । घर के कामों की जिम्मेदारी बेटे पर ही आती है और बेटा ही पूरी करता है। साथियों अभी भी समाज में यह सोच नहीं बन पाई है की, हमारी बेटीया भी परिवार की जिम्मेदारियाँ उठा सकती है। 
  • बेटी को चार दीवारी के अंदर चूल्हा-चौका करना है इस कारण भी बेटा और बेटी में अंतर निर्माण होता है।
  • हमारे समाज में यह सोच बनी है की , '' लड़किया लड़कों की बराबरी नहीं कर सकती ''
  • शादी होने के बाद घर का मुखिया बेटा होता है इस कारण बेटी अपनी इच्छा कभी पूरी नहीं कर सकती। 
  • भारतीय समाज ही नहीं कई अन्य समाजों में भी नारीजाति को कमजोर समझा जाता है। उन्हें सज्जा या प्रयोग की वस्तु मात्र समझा जाता है। 


बेटियाँ बेटों से कम नहीं | Daughters not less than sons

  • आज की सदी की बेटियाँ पुराने सदी के जैसी नहीं रही है की, चार दिवारी के अंदर कैद बनके रहे।
  • आज के सदी में बेटियाँ बेटे की बराबरी कर रही है। 
  • आज अपने हिन्दुस्थान की बेटियों ने घर का चूल्हा - चौका सँभालते हुए अपने कार्य में सफलता हासिल की है। 
  • एक बेटी शादी होकर अपने ससुराल जाती है, तभी यह बेटी घर परिवार सँभालते हुये अपने कार्य में सफल हुई है। 
  • आज के सदी में '' बेटियों '' ने इतिहास रचा है।    
  • बेटियों को माता -पिता ने सही मौका दिया तो, अपना, अपने परिवार और देश का नाम इतिहास में दर्ज करा सकते है।   
  • कुछ लोग बेटी और बेटे को एक समान नहीं समझते, वही लोग सामाजिक अत्याचारों को बढ़ावा देते है। 

▪️ राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज की जीवनी 

भारत की बेटियाँ | Daughters of india

आज के इस आधुनकि युग में वक्त बदल रहा है। भारत की बेटियाँ कहा से कहा पहुंच रही है। तो देखिए हम कैसे अपनी सोच को बदले और अपनी बेटी को गर्भ में ना मारे, उसे भी जीने दे , उसे भी जीने का अधिकार है। उसे धरती पर अवतरित होने दीजिये और बेटी को पढ़ाइये क्या पता हमारी बेटी आनेवाले कल में भारत की आन, बान और शान हो सकती है। जैसे की ,..

सावित्रीबाई फुले 
मा. प्रतिभाताई पाटिल 
  • मा. प्रतिभाताई पाटिल भारत के प्रथम महिला राष्ट्रपति थे। 

डॉ. किरण बेदी
  • डॉ.किरण ब्रज बेदी 1972 भारतीय पुलिस दल में दाखल होनेवाली प्रथम भारतीय महिला अधिकारी है।   
 हिमा दास 
  • जुलाई 2018 में हिमा दास ने फिनलैंड के टैम्पेअर शहर में आयोजित आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में 400 मीटर रेस को 51.46 सेकेण्ड में पूरा करके प्रथम आकर गोल्ड मेडल हासिल की और  देश,अपने परिवार का नाम इतिहास में दर्ज किया।   


एम.सी.मेरी कोम ( M .C. Mary Kom )
झाशी की रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी 




खुद को और समाज को बदले | Change yourself and society 

बेटा- बेटी एक सामान करने के लिए हमें समाज में परिवर्तन करना होगा। आज के सदी में बेटियाँ बेटों की  बराबरी करने लगी है। लेकिन यह समाज, परिवार समज नहीं रहा है और नन्ही बेटी को गर्भ में ही मार देता है। हमें अपना नजरिया और सोच को बदलना होगा। बेटी को बेटे से कम नहीं समझना चाहिए। बेटी को अपने सपने पुरे करने का मौका देना चाहिए, मदद करना चाहिए, उन्हें समझना चाहिए।

बेटा बेटी एक समान मानने की सुरवात अपने घर से अपने परिवार से करना चाहिए। हमें अपने भाई-बहन और छोटे बच्चों को बताना होगा की बेटा बेटी में कोई बड़ा-छोटा नहीं होता। बेटियाँ भी बेटों की बराबरी करते हुए अपने क्षेत्र में नाम रोसन करती है।

बेटी को पढ़ाने के लिए सबसे पहले एक बेटी ने स्कुल खोली जिसका नाम सावित्रीबाई फुले है। एक बेटी ने बेटियों के अध्यन के लिए शिक्षा का द्वार खोल दिया है तो, हम बेटी को पढ़ाई से पिछे क्यों रखे। बेटी को पढ़ाई में पिछे नहीं रखना चाहिए। 

एक बेटी पढ़ने से पुरे परिवार को शिक्षित करती है। परिवार को बहुत ही अच्छे संस्कार देती है। परिवार की जिम्मेदारियाँ बहुत ही बेहतरीन तरिके से निभाती है।

नारीजाति पर अत्याचार बढ़ते जा रहा है। हमें महिलाशसक्ति करण के कार्यक्रमों से समाज को जागृत करना चाहिये। नारी जाति के अत्याचारों के खिलाप आवाज उठानी चाहिए। इज्जत करनी चाहिए। 

महिलाशसक्ति करन के माध्यम से '' बेटी बेटा '' को एक समान करना है।           
      
वक्त के साथ -साथ लोगो की सोच का नजरिया भी बदल रहा है, जहा पहले महिलाओं को सैना में भर्ती नहीं किया जाता था। पहले पुरुषों को ही सैना में भर्ती किया जाता था। वही अब बेटियाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। 

सबसे बड़ी बात यह है की भारतीय वायुसेना में अब महिलाये पायलट उड़ा रहे है। यानि की आज के तारीख में      महिलाये भी प्लेन को उड़ा रही है। 

जब की आज समय बदल रहा है तो आज की जरूरतें व हमारी भूमिकाये भी बदल रही है। आज हमें उस पारंपारिक विचारों की जरूरत नहीं है, जो पहले हुआ करती थी। ऎसे इस विचारों को बदलना जरुरी है।

' सास ' याने की, ' बहुँ ' को, दर्द देनेवाली स्त्री है ऎसा समाज में माना जाता है। ऎसा विचार सास अपने बहुँ के प्रति करती है, इसलिए दोनों में नापसंदगी निर्माण होती है। मैं कहना चाहूँगी की, स्त्री ही स्त्री की दुश्मन है। यह दुश्मनी खत्म हो सकती है, अगर हम सभी नारीसमुदाय ने अपने ' बहुँ ' को अपनी ' बेटी ' समझना चाहिए। और ' बहुँ ' ने अपने ' सास ' को ' आई ' समझना चाहिए। इस तरह से हम अपने परिवार में इस तरह के संस्कार बनाये तो हमें कभी भी ' बेटी ' की कमी महसूस नहीं होगी और हमारा विवाहित जीवन कभी दुःखी नहीं होगा।

एक स्त्री ही अपने बेटी या बेटे का लालन-पालन बहुत ही अच्छी तरह से कर सकती  है।      

हमें यह भी समझना चाहिए की इस विश्व का निर्माण तो लड़कियाँ ही करती है और यह समाज भी हमसे ही बना है। यदि हम अपने घर से बदलाव की शुरवात कर सकते है तो इस समाज को भी बदल सकते है।

इस तरह से हम अपने समाज,परिवार में परिवर्तन ला सकते है, ताकि यह भूमिकाये लिंग के आधार पर न होकर रिश्तों के आधार पर हो।   

बेटी जिस घर में है, वह परिवार भाग्यशाली है और बेटा जिस घर में है , वह परिवार दुर्भाग्यशाली है। नहीं, बेटी जिस परिवार में जन्म लेती है और उसका परिवार जितना खुश रहता है उतना ही लड़के का परिवार भी खुश रहता है। पहले के ज़माने में लकड़ा-लड़की में पक्षपात होता था। बेटी को ज्यादा पढना , बेटी के लिए खर्चा करना बहुत ही आगे पिछे देखते थे। बेटी को पराया धन समझते थे। आज के युग में कुछ ही परिवार है जो बेटे की उम्मीद रखते है। आज के तारीख में समाज में बहुत ही परिवर्तन हुआ है। बेटा हो या बेटी दोन्हों ही एक समान मानना चाहिए। अभी पहले जैसा पक्षपात नहीं रहा है और रखना भी नहीं चाहिए। 


बेटी के लिए सरकार की योजना | Government plans for daughter

सरकार ने बेटियों के लिए बराबर सरकारी नौकरी, बिमा, वारस आदि में बराबर रह सकती है। दहेजप्रथा, भ्रूणहत्या आदि के खिलाप सरकार कार्यवाही कर रही है। 

बेटी की पढ़ाई से लेकर शादी तक का खर्चा सरकार ही उठा रही है। कुछ राज्यों में शादी के बाद बेटी होने पर मदद मिलती है। 
  
अगर यह लेख अच्छा लगे तो Whatsapp और Facebook पर शेयर जरूर करे। 


Author By 
Aarti  


  यह भी जरुर पढ़े  



Share on Google Plus

About Blog Admin

He is CEO and Faunder of www.pravingyan.com He writes on this blog about Tech, Poems, Love story, General knowledge, Earn money, Helth tips, Great lord and motivational stories. He do share on this blog regularly.