कौटिल्य एक महान विचारवंत | Kautilya is a great thinker


चंद्रगुप्त मौर्य के मुख्यमंत्री विष्णुगुप्त जो तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य जिन्हें चाणक्य, कौटिल्य के नाम से जाना जाता है। आज हम आपको इस लेख के माध्यम से महान विद्वान की जीवनी बताने जा रहे हैं।

  कौटिल्य एक महान विचारवंत | Kautilya is a great thinker

''विष्णुगुप्त'' को कौटिल्य और चाणक्य दोनों नामों से जाना जाता है। उनके पिता का नाम ''चाणक'' होने से उनका नाम ''चाणक्य'' पड़ा। ''कौटिल्य गोत्र'' होने से दूसरा नाम ''कौटिल्य'' पड़ा। उनका ''विष्णुगुप्त'' नाम था। उन्होंने राजकीय सिद्धांतो का विवेचन करके राजनीती शास्त्र के रूप में प्रख्यात किया। अतः कौटिल्य को भारतीय राजनीति विज्ञान का जन्मदाता माना जाता है। कौटिल्य के विचारों को कूटनीति और चाणक्य नीति से भी संबोधित किया जाता है। कौटिल्य की कहानी एक राजा बनाने की कहानी है। भारत को कुशल सम्राट देने की गाथा है। एक टूटे हुए इंसान को कामयाबी के तख्त तक पहुचनेवाले बुद्धिमान पंडित है। उनके विचारों ने एक क्रांति पैदा की। एक श्लोक में कहा गया है।

 "सुखयस्य मूलं  धर्म ; धर्मस्य मूलं अर्थ ;अर्थस्य मूलं राज्यं। राजस्य मूलं  इन्द्रियजयः इन्द्रिया जयस्य मूलं  विनयः। विनयस्य मूलं वृद्धो सेवा। "

अथार्त ! सभी सुखों का मूल धर्म है। आनंद धर्म है (नैतिकता धार्मिकता), इसलिए, धर्म को निष्पक्ष रूप से निभाएं। धर्म की नींव अर्थ है (अर्थ, निति ) अर्थ की नींव सही नियम है; सही नियम का मूल आंतरिक आत्म संयम है। विजयी आंतरिक आत्म-नियंत्रण विनम्रता है। नम्रता की नींव बुजुर्गों की सेवा करना है।

इस श्लोक में सम्पूर्ण विश्व को जितने की बात बता दी है लेकिन कौटिल्य को तो सिर्फ भारत  में ही साम्राज्य बनाना था। एक अखंड भारत का सपना था। और इस साम्राज्य में शांति हो वे ऐसा चाहते थे। वे तक्षिला के आचार्य रहे है। कौटिल्य की अर्थशास्त्र रचना काफी लोकप्रियता रही है। आज उनके इतिहास के सारे रचनाओं का अध्यन किया जाय तो भारत को विश्व गुरु बनाने  में उनके  तत्व, विचार काफी बहुमूल्य साबित होंगे। आज कौटिल्य पर रिसर्च करने की ज्यादा जरुरत मैंने महसूस की है। जैसे जैसे इनके बारे में जानकारी मिल रही है इससे काफी प्रेरित हो कर कई विद्वानों व इतिहासकारो ने अपना अपना संशोधन किये जा रहे है। कौटिल्य के कालखण्ड विषयो पर इतिहास कारो का मतभेद दिखाई पड़ता है। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि वह चंद्रगुप्त मौर्य और भारतीय सम्राट के समकालीन थे। कौटिल्य, चन्द्रगुप्त का गुरु मार्गदर्शक और मुख्य प्रणेता था। इस आधार पर यह चौथी शताब्दी का काल कौटिल्य का काल माना जा सकता है। लेकिन कुछ पश्चिमी विद्वानों द्वारा इसे स्वीकार नहीं किया गया था। उनके अनुसार, कौटिल्य का काल ईसा पूर्व दूसरी या तीसरी शताब्दी का होना चाहिए। लेकिन आज पश्चिमी विद्वानों का दावा गलत साबित हुआ है।



जीवन परिचय | Life introduction

नाम : विष्णुगुप्त
उपनाम : चाणक्य, कौटिल्य, भारतीय मैकियावेली
पिता :    चाणक
माता :    जैनेश्वरी
जन्म : 371 इसा पूर्व भारत
मृत्यु : 283 ईसा पूर्व पाटिलीपुत्र
शिक्षा  : तक्शिला विद्यापीठ, आचार्य

कौटिल्य का जन्म, नाम में बहुत भिन्नता है। इनका जन्म संबधित कोई दस्तावेज नहीं है किन्तु  इनका जैनिज़म व बुद्धिजम दो ऐसे साधन है जिसमे इनके बारे में जानकारी निकलकर आती है। इसमें कश्मीरी वर्जन भी शामिल है। जैनिजम के अनुसार इनके पिता व माता दोनों ऋषि जीवन जीते थे। कौटिल्य जब पैदा हुए तब उनके घर पर कुछ ऋषि मुनियो का आगमन हुआ। वे सब कौटिल्य को देखना चाहते थे। उनकी माँ ने कौटिल्य को दिखाया। गुरु ऋषि ने कौटिल्य को देखते बराबर कहा। इस बालक के जीवन में राज योग है, देश का राजा बनेगा। या राजा बनाएगा। यह सुनकर उनके माता पिता काफी चिंतित हुए। वे नहीं चाहते थे की उनका पुत्र उनसे अलग रहे। इसका कारण पूछने पर गुरु ऋषि ने कहा, इस बालक के जन्म से ही दात निकाले हुए है जिसके आगे के दाँत में नागराज का चिन्ह अंकित है। आशीर्वाद देकर चले गए।

एक और घटना सामने आती है जब कौटिल्य बच्चो के साथ खेल रहे थे। वह उन सभी खेलो में अव्वल रहते थे। यह देख उनकी माँ और चिंतित होती है। उस ऋषि की भविष्यवाणी वास्तविक हो जाती है अपने कौटिल्य को बुलाकर उसे अपने सीने से लगा लेती है उससे बिछड़ने के गम से उनके आँसू निकल पड़ते है। जब उसने कौटिल्य को रोने का कारण पूछा, तो माँ ने कहा, तुम्हें खोना नहीं है, इस बात का डर मुझे परेशान करता है। तुम्हारे काम करने का तरीका व व्यवहार एक राजा की तरह है। आपके दांतों में नागराज का चिन्ह आपको राजयोग की भविष्यवाणी की याद दिलाता है। यह सुनकर कौटिल्य ने आगे से एक पत्थर उठाया और अपने नागराज वाले दाँत को गिरा दिया। दुनिया मेरी माँ के प्यार को कभी भी नहीं छीन पाएगा। ऐसे अध्य्म साहस कौटिल्य के बर्ताव से दिखाई देते है।


एक बार एक और कहानी सामने आती है जब कौटिल्य घने जंगल में अकेले अपने सामने के दरवाजे पर कंटीली झाड़ियों को फेंक रहा था। अब एक दिन कमजोर की तरह एक व्यक्ति की आवाज सुनी गई। यह पता चला कि वह एक मंत्री पद पर रह चुके थे। लेकिन आज की हालत बहुत खराब थी। कौटिल्य के पूछने पर राजा व उनके सैनिको द्वारा प्रजा पर हो रहे अत्याचार का सारा इतिहास उनके सामने अवगत कराया। और राजदरबार में आपके लिए निमंत्रण है की आप जैसे ब्राम्हण पंडितो को नगरभोज के लिए आमंत्रित किया गया है। यही संदेश पहुंचाने हेतु आपको ढूंढते हुए यहाँ तक पंहुचा हु। यह हाल सुनकर काफी बुरा महसूस हुआ। और कौटिल्य ने बतलाया की इन काँटेवाली झाड़ियाँ उखाड़ उखाड़ फेकना मेरा पागलपन नहीं है इन काँटेवाली झाड़ियों ने मेरे पिता को दर्द देकर मुझसे छीन ली है। इसलिए मै इन्हे उखाड़कर फेक रहा हु। मेरे जीवनरूपी यात्रा में जो भी इस प्रकार के कांटे अवरोध उत्पन्न करेगें उन्हें मै उखाड़कर फेक दूंगा। मैं अपने बनाए हुए रास्तो पर ही चलूँगा।

जब कौटिल्य राजा के निमंत्रण पर राजा के महल में पहुंचा तो उनके साथ कुछ अन्य ब्राह्मण साथ थे। राजदरबार में उनके लिए सभी प्रकार की मेहमान नवाजी व्यवस्था कर रखी थी। कौटिल्य पहले से ही एक कुरूप और क्रोधी व्यक्ति था। उन्होंने अपना आसान ग्रहण कीया। कुछ समय बाद, महाराजा धनानंद का आगमन हुआ। महाराजा नन्द ने सभी आगंतुक ऋषि मुनियों को कुछ राजमुहरे दान में भेट देने का विचार बनाया है। इस हेतु सभी पद क्रमानुसार भेट स्वीकार करने का आव्हान किया। लेकिन कौटिल्य ने इस उपहार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। पाप से बनाया लिप्त धन कुल के नाश का कारण होता है। उसने राजा से आग्रह किया कि आप अपनी प्रजा पर इतना अत्याचार न करें। उनके बुरे कामों के पाप में शामिल न हों। राजा के दरबार में राजा को बदनाम करने का साहस किसी में नहीं था। कौटिल्य के इस अपमान को राजा सहन नहीं कर सका और कौटिल्य के द्वेष और कटु शब्दों से घृणा किया। उसने सैनिकों को आदेश दिया कि वे दरबार से बाहर निकलें और बाहर आएं। तब, गुस्से में कौटिल्य ने भरी सभा में राजा को चेतावनी दी, आज भी इस अहंकार के कारण मेरा अपमान और तिरस्कार हुआ है। इस सभा से मुझे निकाल रहे हो। लेकिन याद रखना समय बहुत बलवान है एक ब्राह्मण का अपमान ईश्वर के अपमान करने के बराबर है। मैं आज संकल्प लेता हूं कि, मैं पूरे नंद साम्राज्य को नष्ट किए बिना और अपना साम्राज्य स्थापित किए बिना शांत नहीं रहूंगा। तबतक मैं अपनी शाख को नहीं बांधूगा। यही कारण है कि एक दृढ़ संकल्प ने एक नए इतिहास को जन्म दिया है। सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक बनाया जा सकता है और इसे बनाने के लिए नए विकास विकसित किए गए हैं। जिसमें अर्थशास्त्र एक बहुत लोकप्रिय पाठ है। अर्थशास्त्र का नाम भले ही रखा गया हो, लेकिन इस पाठ में राजनीति, सामाजिक, आर्थिक और मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों का समावेश किया गया है। आज अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों ने इन सिद्धांतों के आधार पर दुनिया में अपने पैर जमा लिए हैं। जैसे डॉलर, गूगल, फेसबुक, व्हाट्सअप आदि।







विषयो का चिंतन का मुख्य आधार : अर्थशास्त्र | The main basis for contemplation of topics: economics


कौटिल्य के विचारों का मुख्य स्रोत अर्थशास्त्र है। एक बार उनके शिष्य ने कौटिल्य से प्रश्न पूछा कि गुरुदेव  अर्थशास्त्र क्या है ? कौटिल्य ने कहा, “मनुष्य की आजीविका'' को अर्थ कहते हैं। मानव निर्मित भूमि को अर्थ भी कहा जाता है। इस भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने के विचार को आकार देने वाला विज्ञान अर्थशास्त्र कहलाता है। "अर्थशास्त्र" का मूल शब्द राज्य धर्म है। यह एक राज्य धर्म की सीमा में है कि राज्य का हित केवल लोगों के हित में है। राजा का अपना कुछ नहीं, सब कुछ लोगों का प्रिय है। इसका मतलब है कि हमें आज राजनीति को सुनना होगा। तभी अपने साम्राज्य का विस्तार कर सकते हैं उसे संभाला जा सकता है। तभी एक विशाल साम्राज्य स्थापित होगा। यह 2300 साल पहले कौटिल्य ने समझा था। कौटिल्य ने सिर्फ बात नहीं की, बल्कि की। जिसे पूरा कर पाना आसान नहीं था। लेकिन एक संकल्प ने इतिहास रच दिया। कहते है ! संकल्प में बहुत शक्ति होती है। इसलिए प्राण जाये तो जाये, लेकिन वचन न जाये। मन के हारे हार है और मन के जीते जित है। 

इस पाठ के अनुसार, चिंतन की स्थिति वास्तविकता और व्यावहारिक आधार पर प्रतिबिंबित होती है। इसमें 6000 श्लोक है। जिसमे 15 अधिकरण (tribunal), विषय विभाग  (theme section) ,150 प्रकरण( case) तथा 180 विभाग (Department) शामिल है। इस ग्रन्थ में दो भाग दिखाई पड़ते है एक अपने राज्य व्यवस्था सम्बन्धित, दूसरा परराष्ट्र संबंधित है।



राजव्यवस्था | Arrangement of the governance :

 कौटिल्य एक खुसाग्र बुद्धि के धनि थे। साथ साथ होनेवाले भविष्य के घटनाओ को भाँप लेते थे। उन्हें अनुमान था कि सिकंदर भारत पर हमला करेगा, यहां तक कि दुनिया को जीत भी लेगा। सिकंदर महान को कैसे रोकें उसे रोकने के लिए, उसके पास एक चक्रीय सम्राट होना चाहिए। यही बात उन्होने राजदरबार में रखी थी। लेकिन तत्कालीन नंद वंश के राजा धनानंद अपनी विलासिता में लीन थे। अपने लोगों से कर का भुगतान करते थे।अपने साम्राज्य को और कमजोर बना रहे थे। पूरा चरित्र अहंकार से भर गया। उन्होंने कौटिल्य की बात नहीं मानी और उन्हें अपमानित करके भगा दिया। कौटिल्य को अपने साम्राज्य को मजबूत करना था। उन्हें नंद वंश का एक गरीब लड़का मिला जिसमें उन्होंने एक राजा के गुणों को देखा। उनकी सारी जानकारी ज्ञात की और कौटिल्य ने उसे भविष्य का सम्राट बनाने का फैसला किया।वह लड़का था चंद्रगुप्त मौर्य। वह भी कौटिल्य जैसे गुरु के साथ रहकर खुद को भाग्यशाली समझने लगा। कौटिल्य ने दिखाए गए मार्ग पर अपने कदम रखना शुरू कर दिया। कौटिल्य ने सभी प्रकार की शिक्षा के साथ एक राज्य पर अपना अधिकार पाने के लिए अपनी बुद्धि से प्रशिक्षण लेना शुरू किया। चन्द्रगुप्त सभी साहित्य को निपुण से लेते रहे। जहा विचारो की समानता हो, तो अपने धेय को हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं होती।


कौटिल्य की विदेश निति : के छः सूत्रीय सिद्धांत

(1) संधि : शांति बनाए रखने के लिए समान और अधिक शक्तिशाली राजाओं के साथ शांति का व्यवहार करें। आत्म रक्षा की दृष्टी से शत्रु से भी संधि, लेकिन अंतिम लक्ष्य उसे कमजोर बनाना है।
(2) विग्रह : दुश्मन के खिलाफ युद्ध का निर्माण
(3)  यान : युद्ध की घोषणा किए बिना हमले की तैयारी
(4)  आसन : तटस्था की निति।
(5 )  संश्रय  : आत्मरक्षा की दृष्टी से राजा द्वारा अन्य राजा शरण में जाना।
(6)  द्वैधीभाव : एक राजा से शांति की संधि करके अन्य के साथ युद्ध करने की निति।

खुद को मजबूत बनाने के लिए इन सिद्धांतों को अपनाया जा सकता है। कौटिल्य ने अपने उपदेशों में युद्ध और शत्रु युद्ध को सफल बनाने में सफलता पाई है। चंद्रगुप्त को शुरू में एक गुप्त तरीके से यूनानियों की सेना में भर्ती किया गया था। कौटिल्य का मानना था कि जब तक वह दुश्मन की कमजोरी नहीं जानता, तब तक उसे दोस्त के रूप में रखें। और अपनी वीरता का प्रदर्शन समझ बुझ कर करना चाहिए।  इसलिए कौटिल्य ने भीतर से आघात और बाहर से आक्रमण इस निति को अपनाया। कौटिल्य का मानना था कि, दुश्मन को अपमानित करना शुरू करें, वह खुद टूट जाएगा। इस नीति को अंग्रेजों ने अपनाया था जिन्होंने सुंदर भारत पर कब्जा कर लिया था और 150 वर्षों तक शासन किया था। फ्रोफेसर थॉमस ट्रॉटमैंन ( जो एक बड़े यूनिवर्सिटी के संशोधक हुए ) ने भी अपने इस ग्रन्थ में उल्लेख किया है।

चंद्रगुप्त मौर्य ने पड़ोसी देश के साथ जुड़कर अपनी सेना को बड़ा किया। कौटिल्य का लक्ष्य नंद वंश को नष्ट करना था। और अपने सम्राट को खड़ा करना था। इस मामले में नन्द वंश का साम्राज्य बहुत बड़ा था। उन्हें और अधिक सैन्य बल की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने आध्यात्मिक प्रवचनों का सहारा लिया और अपने लोगों को बनाना शुरू कर दिया व अपनी सैनिक सेना का निर्माण किया। नंदवंश पर हमला करना शुरू किया लेकिन इस बार उसे हार का सामना करना पड़ा। कुछ समय के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य व कौटिल्य को अज्ञातवास होना पढ़ा था।

 एक दिन कौटिल्य शहर में क्या चल रहा था, यह जानने के लिए चल रहा था। उन्होंने एक बच्चे को रोते हुए देखा उसकी मां उसे समझा रही है की ,चंद्रगुप्त और कौटिल्य जैसी गलतियाँ न करें। यदि आप गर्म खिचड़ी में हाथ डालते हैं, तो हाथ जल जाएगा यदि इसे खाना है तो इसे बाहर के हिस्से को थोड़ा सा खाना चाहिए। यह सुनकर कौटिल्य उस माँ के पास जाकर पैर छूकर कहा आज आपने मुझे बहुत बड़ी शिक्षा दी है। मैं हमेशा आपका ऋणी रहूंगा। वह वहाँ से चला गया। और मगध को फिर से हासिल करने के लिए एक नई रणनीति बनाई जिसे उन्होंने अपने अर्थशास्त्र में सप्तांग मार्ग नाम दिया है।




सप्तांग सिद्धांत | Weekly principle

(1) परिधि पर हमला करना चाहिए।
(2) विषकन्या का निर्माण।
(3) जासूस की सेना का निर्माण।
(4) शक्तिशाली सैन्य बल का निर्माण।
(5) योग्यता के आधार पर पदों का निर्माण।
(6) छापामार युद्ध की तैयारी।
(7) अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का निर्माण।

इन सप्तांग मार्ग के साथ चार सिद्धांत ; सामग्री, मूल्य, दंड और भेदभाव को अपनाकर, नंदवंश को समाप्त करने के लिए इस कूटनीति को अपनाया। सबसे पहले महाराज धनानन्द के साम्राज्य के आसपास वाले सम्पूर्ण परिक्षेत्र को एक परिधि बनाकर एक छोटी टुकड़ी बनाया। उस टुकड़ी में अपने सैन्य बल को शामिल करवाए। उनकी जासूसी करवाई जासूसों की जासूसी के लिए अलग टुकड़ी बनवाई थी। नंदवंश के मंत्री परवता को विषकन्या के जाल में फसाया गया। जहां उसकी मौत हो गई। इस तरह विषकन्या के माध्यम से नंद साम्राज्य को खोखला कर दिया गया था। नन्द साम्राज्य के बाहरी क्षेत्र वाले भागो को अपने शक्तिशाली सैन्य द्वारा  आक्रमण कर जितने लगे। वहां उन्हें जीतकर, योग्यता के आधार पर, टीम में, पदों का लालच देकर, दुश्मन से दोस्ती करके, वे नंद साम्राज्य को तोड़ने के लिए चले गए। अन्तः नंद साम्राज्य हार गया और कौटिल्य अपने संकल्प के अनुसार सफल होता है। चंद्रगुप्त मौर्य इस साम्राज्य के सम्राट बने।


"स्वाम्यमात्य जनपद दुर्ग कोष दण्ड मित्राणि प्रकृतयः"अर्थात यह 7 तत्व एक कुशल साम्राज्य के नेतृत्व लिए कौटिल्य बताते है।


  1. स्वामिन - शासक 
  2. आमात्य - मंत्री 
  3. जनपद - उस पर बसे लोगो के साथ क्षेत्र 
  4. दुर्ग - गढ़वाली राजधानी राज्य की रक्षात्मक और आक्रमक क्षमता का प्रतिक
  5. कोष - खजाना
  6. दण्ड - सैनिक
  7. मित्राणि - मित्र


1)  शासक वर्ग को हमेशा अपनी उत्पादन क्षमता को हमेशा ध्यान में रखकर बढ़ाना चाहिए। भ्रष्टाचार-मुक्त साम्राज्य स्थापित किया जाना चाहिए। राजा को हमेशा सावधान रहना चाहिए कि वे भोगविलास में न हों और विषयों के कार्यों का ध्यान रखें। एक राजा को साढ़े चार घंटे ही सोना चाहिए। धन सबंन्धित 3 अंग वार्ता बतलाये है। कृषि ,वाणिज्य और पशुपालन आदि। अर्थात धन उत्पादक, धन वाणिज्य, धन पशुपालन यह सभी को धन माना गया है। 

2) साम्राज्य के सभी विभागों के लिए प्रमुख नियुक्त किया जाना चाहिए। गृह मंत्रालय जैसे कि आज की कैबिनेट, वित्त, शिक्षा, रक्षा, फारेन आदि।

3) लोगों की बोली या छोटे भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार जनपद तैयार करना चाहिए। जिससे क्षेत्र को नियंत्रण में रखा जा सकता है। आज सभी राज्य जैसे पंजाब, उड़ीसा, हरियाणा आदि।

4) गढ़ की रक्षा के लिए किले का निर्माण करें।

5)  आपातकाल को रोकने के लिए और साम्राज्य विस्तार के लिए फंड का निर्माण करना।

6 ) अपने विषयों की रक्षा के लिए सैनिकों का निर्माण करना।

7) विदेशी को मित्र बनाये रखने हेतु पॉलिसी का निर्माण भी इसी समय किया गया था।

इन मुद्दों के आधार पर, आज हम जानते हैं कि कौटिल्य ने नीति और दृष्टि से साम्राज्य बनाया था। चाहे वह राजनीतिक शासन व्यवस्था हो, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हो, योजना आयोग हो या ऑडिटिंग मैकेनिज्म हो वह काफी सुपर मेसी पावरफुल कंस्टीटूशन (सविधान) की नीव दिखाई पढ़ती है।

चन्द्रगुप्त मौर्य के सम्राट बनने के बाद उन्होंने रानी दूरधरा को अपनाया। जिससे उन्हें एक राजकुमार मिला जिसका नाम बिन्दुसार था। बिन्दुसार को भी कौटिल्य ने राज गुण डालते रहते थे। लेकिन कुछ संदर्भों से संकेत मिलता है कि सुबुंदु नामक एक मंत्री के अनुरोध पर, बिन्दुसार ने कौटिल्य को निर्वासन के लिए जाने के लिए मजबूर किया। उन्हें बताया गया कि बिन्दुसार की माँ का पेट काटकर उनकी हत्या कर दी गई। इसलिए गलती न होने के बावजूद कौटिल्य को अज्ञात का सामना करना पड़ा। लेकिन अंत में, सच्चाई सामने आई है कि बिन्दुसार के पिता को भोजन में जहर मिलाकर दिया जाता था जो धीमे-धीमे शरीर में प्रवेश करता था।  चंद्रगुप्त को उसकी आदत थी। लेकिन एक दिन चंद्रगुप्त ने अपनी रानी के साथ भोजन किया। उनकी रानी गर्भवती रहती है। राणी खाना खा लेती है। उनका नौ महीना चल रहा होता है  जिससे उनके पेट में दर्द उठता है। उन्हें जहर की आदत न होने से यह दर्द सहन नहीं कर पा रही थी। बिन्दुसार अपनी माँ के पेट में ही था। बिन्दुसार को जीवित बचाने हेतु ,कौटिल्य ने उनकी माँ का पेट काटा था। यह जानकारी राजमहल की दासी दुर्धा जो बूढी थी और बिन्दुसार के जन्म की साक्षी थी। दुर्धा के बताने पर बिन्दुसार बहुत शर्मिंदा हुए। अपनी गलती के लिए, वे अपने सैनिकों के साथ कौटिल्य को खोजने के लिए जंगल में जाते हैं। कौटिल्य को ढूढ़ने पर बिन्दुसार क्षमा मांगते है। कौटिल्य उन्हें क्षमा तो कर देते है। लेकिन अंतिम समय तक वे वन मे ही रहेंगे। प्रतिज्ञा करते है। अतः उनकी मृत्यु जंगल में ही हो जाती है, ऐसा माना जाता है।

कौटिल्य एक महान दार्शनिक, लेखक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, राजनीतीज्ञ्य, समुद्र शास्त्र में भी पारंगत थे।

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