शुक्रनीति क्या है ? | shukraneti kya hai ?

          
प्राचीन भारत का राजकीय तत्वों का विश्लेषण करने पर आज हम मध्ययुगीन कालखंड का अभ्यास करना चाहे तो, उसमे शुक्र व शुक्रनीति के विचारो योगदान महत्वपूर्ण है।

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  शुक्रनीति क्या है ? | shukraneti kya hai ?

शुक्रनीति की जानकारी | shukraniti ki janakari

11 वी शताब्दी में लिखा गया शुक्रनीति से आभास होता है की लेखक शुक्र पर मनु, व्यास,कौटिल्य, जैसे विद्वान् पंडितो का अधिक प्रभाव रहा होगा। इस ग्रन्थ में एक महत्वपूर्ण बात यह है की मंत्री मंडल व मंत्रियों के विभाग में वर्गीकृत करना या विभागों को सौपना यह आज भी स्वीकार करने योग्य है।



शुक्र के दस विभागों की महत्वपूर्ण श्रेणी की जानकारी | Important sections of ten departments of Venus


1 पुरोहित 
2 प्रतिनिधि 
3 प्रधान 
4 सचिव 
5 मंत्री 
6 प्राधवीवाका 
7 पंडित 
8 सुमंत 
9 अमात्य 
10 दूत 

पुरोहित : पुरोहित वैदिक कालखंडो से ही महत्वपूर्ण पद है। वह राजा का गुरु माना जाता है। जो शस्त्र व शास्त्रों का ज्ञाता होता है। उसे काम, क्रोध और लोभ में, आसक्ति रहित, कामुक और धार्मिक जीवन में संलग्न होना चाहिए। वह राजनीती में माहिर होता है। जैन उपनिषिदों, बौद्ध के आंदोलन से पुरोहित का महत्व धीरे धीरे कम होता नजर आया है।

प्रतिनिधि : राजा के अनुउपस्तिथी में प्रतिनिधि यह काम पूर्ण करता है। शुक्र ने अपने ग्रन्थ में इसका वर्णन में लिखा है की ,प्रतिनिधि याने जातक का उपराजा। प्रतिनिधि को यह समझने के लिए योग्य होना चाहिए कि वह भूभाग, समय और स्थान के संदर्भ में कुशल और अकुशल कार्य को पहचानता है।

प्रधान : प्रतिनिधि जैसा ही इनका कार्य होता है। लेकिन इनका प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण होता है। जो शासन के सभी कार्यों का सामान्य मार्ग निर्देशन करने की कार्यनिर्वाह-क्षमता रखता है।

सचिव : सचिव वह होता है, जो अपने कार्यों के मामले में युद्ध मंत्री होता है। वह सेना और उसके कार्यों का पूरा ज्ञान रखता है। जो शासन के सभी कार्यों का सामान्य निरीक्षण करने की क्षमता रखता है।

मंत्री : मंत्री अथवा विदेश मंत्री इनका दर्जा ऐसा होता है जैसे इनको "महासंधि विग्राहक"के रूप में जाना जाता है। विदेश मंत्री को चार महत्वपूर्ण काम करने पड़ते थे। साम याने साठगाठ ,दाम याने संतुष्ट करना, दंड याने बल का प्रयोग करना, और भेद याने शत्रुता में फुट डालना।

प्राधविवाका : प्राद्विवेक मंत्रियों के क्रम में मुख्य न्यायधीश होता है। यह एक भविष्यवक्ता है, जो मुख्य न्यायाधीश है और न्याय विभाग का मुख्य सियासी अधिकारी भी है। उसे शास्रीय-विद्या संबंधी और लोक व्यवहार का ज्ञाता होना चाहिए।

पंडित : पंडित को मंत्री धर्म व निति संबंधी का प्रमुख होता है।

सुमंत : सुमंत याने खजिनदार होता है। उन्हें भण्डारिका से सम्भोधित किया गया है। इसे मंत्री या शुक्र का राज-कोष का अथ्यक्ष कहा जा सकता है, जिसे आवक-जावक के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए।

अमात्य : अमात्य याने महशुलमंत्री के क्रम में आते है। जमीन व खानो से उत्पन्न पर करवसूल करना व उन हिसाब किताब की जवाबदारी का काम संभालना इत्यादि इन श्रेणी के मंत्रियो को करना होता है। नया सदस्य देश और दस्तावेज़ का ज्ञाता होना चाहिए। वह राज्य में स्थित गांवों, गांवों और जंगलों की भूमि के माप का रिकॉर्ड रखता है और उनसे होने वाली आय का विवरण भी देता है।

दूत : दूत याने प्रसारण मंत्री। पूर्वता के क्रम में अंतिम स्थिति दूत की होती है। उसे भाषा, दूसरे के लिये बोलनेवाला, साहसिक, देश और अवसर की स्थिति का ज्ञाता होना चाहिए।
मध्यकाल में भी वर्णाश्रम व्यवस्था का प्रभाव दिखाई पड़ता है। राजा का धर्म क्षत्रिय धर्म का माना जाता था। जिससे अधिकतम मंत्री सिर्फ क्षत्रिय थे। लेकिन शूद्र भी मंत्री हो ऐसा शुक्र को लगता था।

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