Wednesday, 22 July 2020

raksha bandhan kya hai?:रक्षा बंधन क्या है?


फूलों का तारों का सबका कहना है, एक हजारों में मेरी बहना है, सारि उमर मुझे संग रहना है... फूलों का ..

भाई बहन त्योहार क्या है (Bhai bahan tyohar kya hai), राखी क्या है (rakhi kya hai), रक्षा सूत्र क्या है (rakshasutr kya hai), आइयें जाने रक्षाबंधन क्या है (raksha bandhan kya hai)

भाई और बहनों के अतुलनीय प्रेम को दर्शाने वाले त्योहार रक्षाबंधन का इतिहास काफी प्राचीन है. यदि हम समाज में प्रचलित परंपराओं का पालन करते हैं, तो रक्षाबंधन का त्योहार वैदिक काल से ही मनाया जाता है. यह त्योहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. 

रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के अटूट रिश्ते को दर्शाता है. रक्षाबंधन का त्योहार सदियों से चला आ रहा है. यह त्यौहार भाईचारे के प्यार का प्रतीक भी है. रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं. यह त्योहार हिंदुओं के लिए विशेष महत्व रखता है. आइए जानते हैं कि इस साल रक्षाबंधन का त्योहार कब मनाया जाएगा. यह त्योहार कैसे मनाएं ? 


रक्षाबंधन भाई-बहनों का त्योहार है जो मुख्य रूप से हिंदुओं के बीच प्रचलित है, लेकिन भारत के सभी धर्मों के लोग इसे समान उत्साह और भावना के साथ मनाते हैं. इस दिन का  नजारा पूरे भारत में देखने लायक रहता है और हो भी क्यों न, यह एक विशेष दिन है जो भाइयों और बहनों के लिए बनाया गया है.

राखी का त्योहार जिसे रक्षा बंधन कहते है और यह श्रावण माह में आता है. रक्षाबंधन के पावन पर्व पर कलाई में रक्षा सूत्र बांधने की परम्परा सदियों से चली आ रही है. शिष्य अपने गुरु के कलाई पर रक्षा सूत्र बाधंता है. चलिए जानते है रक्षा बंधन की सुरवात कैसे हुई? बहन भाई के कलाई पर राखी क्यों बांधती है. आइयें जाने रक्षा बंधन की रोचक कथाएँ.


रक्षाबंधन का अर्थ : Meaning of Rakshabandhan


  • रक्षा का मतलब सुरक्षा 
  • बंधन अर्थात बाध्य 

रक्षाबंधन क्या है?:What is Rakshabandhan?


हिन्दू और जैन धर्म में रक्षाबंधन पर्व श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. रक्षाबंधन के दिन राखी अथवा रक्षा सूत्र का बहुत ही महत्व है. राखी एक धागे से लेकर सोने, चाँदी, रेशम अथवा  डायमंड तक हो सकती है. राखी के दिन बहना अपने भाई के जीवन में सुख समृद्धि और सफलता की कामना करते है. 

राखी के दिन बाजार में मिठाइयाँ, उपहार, खरीदारी चलते रहती है. मेहमानों का आना जाना लगा रहता है. बहने भाइयों को राखी बांधती है और भाई अपनी ओर से कुछ उपहार देता है. रक्षाबंधन के दिन अगर किसी बहन या भाई आपस में बात नहीं कर रहे होंगे तो भी राखी के दिन बातें करने लग जाते है. राखी का त्योहार रूठे हुए बहन  को मनाता है. 

रक्षा बंधन इस साल 3 अगस्त 2020 को मनाया जाएगा.



रक्षा बंधन का त्योहार कैसे मनाएं?:How to celebrate the Raksha Bandhan festival?


  • पूजा के थाली में रोली, चंदन, अक्षत, दही, राखी और मिठाई रखें.
  • थाली में घी का दीपक रखें, जिससे भाई की आरती होनी चाहिए.
  • सबसे पहले भगवान को राखी और पूजा की थाली अर्पित करें.
  • इसके बाद अपने भाई को पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें.
  • पहले अपने भाई  के पाव धोएं, तिलक लगाएं, मिठाई खिलाए फिर राखी बांधें और फिर आरती करें.
  • राखी बांधने के समय भाई-बहन का सिर खुला नहीं होना चाहिए सर पर रुमाल रखें.
  • राखी बांधते समय निम्नलिखित मंत्र का जाप करें 
'येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
    तेनत्वामभिबघ्नामि रक्षे माचल-माचलः।
    • राखी बांधने के बाद माता-पिता और गुरु का आशीर्वाद लें, इसके बाद अपने इच्छा अनुसार बहन को उपहार दीजिए. 
    • इस तरह से रक्षाबंधन का यह त्योहार 03 अगस्त 2020 को मनाएं.


    रक्षा बंधन की रोचक कहानियाँ: Interesting stories of Raksha Bandhan


    हिंदू श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) की पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला यह त्योहार भाई का अपनी बहन के प्रति प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन पर बहनें भाइयों की दाहिनी कलाई पर राखी बांधती हैं, उन्हें तिलक करती हैं और उनकी रक्षा करने का संकल्प लेती हैं। हालाँकि, रक्षाबंधन की व्यापकता इससे कहीं अधिक है। राखी बांधना केवल भाइयों और बहनों के बीच की गतिविधि नहीं है। देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी राखी बांधी जा रही है।

    रक्षाबंधन के त्योहार से कुछ कथाएँ जुडी हुई है वे कथाएँ निम्नलिखित है. 

    • कथा -1 ( देवराज इंद्र)

    अयोध्या के राजा दशरत पुत्र श्रीरामचन्द्रजी ने  दरबार में भरत और लक्ष्मण को बुलाकर कहा, " भाइयों अपने राज्य में मेरी इच्छा राजसूय यज्ञ करने की है क्योंकि वह राजधर्म की चरमसीमा है. इस यज्ञ को करने के बाद समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा सुखसमृद्धि और सफलता के फल की प्राप्ति होती है.अतः तुम दोनों विचार विनिमय करके मुझे बताओं कि इस लोक और परलोक के कल्याण के लिये क्या यह यज्ञ उत्तम रहेगा?"

    राजा के यह शब्द सुनकर धर्मात्मा भरत बोले, '' महाराज, इस धरती पर धर्म, जीवा और स्वयं यह प्रकृति आप ही में प्रतिष्ठित है और आप यह यज्ञ क्यों करना चाहते है.  इस धरती आपसे कोई भी युद्ध नहीं करना चाहते है शिवाय असुरों. असुरों का संहार करने के लिए हम हमेश तैयार ही रहते है.तो फिर यह राजसूय यज्ञ क्यों?

    भरत के अनमोल वचन सुनकर श्रीराम बहुत प्रसन्न हुये और बोले, "भरत! तुम्हारे मुख से निकले हुए शब्द धर्म की रक्षा और सृष्टि के हित में योगदान देनेवाले है. इसलिए मैं राजसूय यज्ञ करने की इच्छा त्याग देता हूँ."

    उसके बाद लक्ष्मण बोले, "हे रघुनन्दन! सभी पापों को नष्ट करने वाला तो अश्‍वमेघ यज्ञ भी है। यदि आप यज्ञ करना ही चाहते हैं तो इस यज्ञ को कीजिये क्यों क इंद्र को ब्रह्महत्या लगी थी, तब वे अश्वमेघ यज्ञ करके पाप मुक्त हुए थे. तभी प्रभु श्रीराम ने भारत से कथा बताने को कहा... कथा इस प्रकार है.


    वृत्रासुर नाम के असुर की कहानी: 

    भविष्य पुराण के अनुसार सतयुग में, "प्राचीनकाल में वृत्रासुर नामक असुर पृथ्वी पर पूर्ण धार्मिक निष्ठा से राज्य करता था. एक बार वह अपने ज्येष्ठ पुत्र मधुरेश्‍वर को राज्य भार सौंपकर कठोर तपस्या करने वन में चला गया. उसकी तपस्या से इन्द्र भयभी हो गया. वह भगवान विष्णु के पास जाकर बोले किजगत के पालन हर! तपस्या के बल से वृत्रासुर ने इतनी अधिक शक्‍ति अर्जित कर ली है कि मैं अब उस पर शासन नहीं कर सकता और मेरी शक्तियाँ भी उसके आगे बहुत कम है.यदि उसने तपस्या से वरदान प्राप्त कर के कुछ शक्ति और बढ़ा ली तो हम सब देवताओं को सदा-सदा के लिए उसका गुलाम बनकर हमेशा के लिए रहना पड़ेगा. इसलिये जगत के पालन हार! आप कृपा करके तीनों भुवन को उसके हाहाकार से बचाइये.

    "देवराज इन्द्र की यह प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु बोले कि मैं वृत्रासुर को नहीं मर सकता क्यों की उसने मुझसे वरदान प्राप्त किया है लेकिन मैं आपके प्रार्थना को भी अस्वीकार नहीं कर सकता. इसलिये मैं अपने तेज को तीन भागों में इस प्रकार विभाजित कर दूँगा जिससे तुम स्वयं वृत्रासुर का वध कर सको. मेरे तेज का एक भाग तुम्हारे अन्दर प्रवेश करेगा, दूसरा तुम्हारे वज्र में और तीसरा पृथ्वी में क्यों वृत्रासुर के वध के बाद उसका भार धरती संभाल सके. जगत के पालन हार से वरदान पाकर इन्द्र देवताओं के साथ उस वन में गये जहाँ वृत्र तपस्या कर रहा था. दोनों में भयानक लढाई हुए और इन्द्र ने अपने शक्‍तिशाली वज्र  का प्रहार वृत्रासुर के छीने पर किया और उसे धरती पर मार गिराया  इस तरह से इंद्र ने विजय प्राप्त किया. इन्द्र को इस बात का दुःख हुआ की मैंने एक बेगुनाह को मार दिया मुझे इस गुनाह का दंड अवश्य मिलना चाहिए इसलिए वे  अन्धकारमय स्थान में जाकर प्रायश्‍चित करने लगे.इन्द्र अचानक इंद्र लोग से कुछ दिनों के लिए अदृश्य हो गए तभी देवताओं को बहुत बिचार आया की इन्द्रलोग का शासन कोण चलाएगा इसलिए सभी देवता गण विष्णु भगवान से प्रार्थना की कि हे पालन हार! वृत्रासुर की हत्या देव लोग के सरक्षण के लिए की गई थी इसमें सभी देवताओं की सुरक्षा है लेकिन इस घटना का पाप देवराज इन्द्र को भुगतना पड़ रहा है. इसलिये आप उनके उद्धार का कोई मार्ग सुजाए. यह सुनकर विषणु बोले कि यदि इन्द्र अश्‍वमेघ यज्ञ करके मुझ यज्ञपुरुष की आराधना करेंगे तो वे पाप से मुक्त होकर इन्द्रलोग लौट जाओंगे. इन्द्र ने ऐसा ही किया और अश्‍वमेघ यज्ञ सम्पन्न किया  इस तरह से इंद्र ने अपना प्रायचित्त पूरा किया.

    इस घटना में वृत्रासुर से विजय प्राप्त करने के लिए उनकी पत्नी देवी शची ने इंद्र के हाथ में रक्षा सूत्र बांध दिया था और यह घटना श्रावण मास के पूर्णिमा की थी इसलिए रक्षाबंधन का यह त्योहार मनाया जाता है. 


    कथा -2 (श्रीकृष्ण और द्रोपती)

    महाभारत में श्रीकृष्ण और द्रोपती सवाद मिलता है. इंद्रप्रस्त में शिशुपाल से युद्ध करते समय सुदर्सन चक्र चलाते समय श्रीकृष्ण की एक उनकली से रक्त निकल रहा था. उस समय द्रोपती ने अपने साड़ी के पल्लू को चीरकर जख्म की जगह पर बाधा दिया. यह दिन श्रावण मास के पूर्णिमा का था. उस समय श्रीकृष्ण ने द्रोपती को वचन दिया की जब कभी भी तू समस्या में रहेगी बहना तो मुझे पुकार लेना मैं दौड़ा चला आऊंगा.

    दुशासन जब द्रोपती का चीरहरण कर रहा होता है तभी द्रोपती श्रीकृष्ण को पुकारती है और चिर को बढाकर रक्षा करता है. 


    कथा -3 (युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण)

    महाभारत में युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद मिलता है. पौराणिक कथा में बताया गया है की महाराज युधिष्ठिर कवरों से युद्ध में विजयी होने के लिए, युद्ध निति पूछने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के तरफ गए तभी श्रीकृष्ण ने कहा की आप अपने पूरी सेना को रक्षासूत्र बांध दीजिए. युद्ध में आपकी जित निश्चित है. रक्षासूत्र बांधने से सफलता मिलती है. महाराज युधिष्ठिर को भी सफलता मिली. महाराज युधिष्ठिर ने अपने सेना को रक्षासूत्र श्रावण मास के पूर्णिमा के दिन ही बांध दिया था. 


    कथा - 4 (राजा बलि)

    कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के दो पुत्र हुए थे. 1) हिरण्यकश्यप और 2) हिरण्याक्ष थे. हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- 1) अनुहल्लाद, 2) हल्लाद, 3) भक्त प्रह्लाद और 4)संहल्लाद. प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बलि का जन्म हुआ था. हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का जन्म धरती पर हुआ तभी धरती पर अंधकार छा गया था. तभी सभी देवतागण भयभीत हुए थे की धरती पर शैतानी शक्ति का जन्म हुआ है. राजा बलि का राज्य तीनों भुवनों में था. राजा बलि का राज्य तीनों लोगों से कैसे हटाया जायेगा इस लिए सभी देवतागण श्री हरी के पास गए उन्हों ने समुद्र मंथन के लिए कहा. इंद्र देव ने समुद्र मंथन किया.

    समुद्र मंथन के समय निकला हुआ अमृत श्री हरी ने मोहिनी रूप धारण कर के सभी अमृत देवताओं को पिलाया गया और देवता गण अमर हो गए. इंद्र ने अपने वज्र से राजा बलि का वध किया लेकिन शुक्राचार्य ने राजा बलि को पुनः जीवित किया. राजा बलि ने पुनः तपस्या कि और शक्तिया अर्जित किया और तीनों भुवनों में अपना जयजय कार किया.    

     विष्णु भक्त, दानवीर राजा बलि विरोजन नामक साम्राज्य के राजा थे. उनका राज्य दक्षिण भारत में स्थापित था और उन्हों ने बलिरामपुर को राजधानी बनाया था. केरल में ओणम का पर्व राजा बलि के याद में आज भी मनाया जाता है. केरल में राजा बलि को '' मावेली '' कहा जाता है.  

    दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में तीनों भुवनों पर विजय प्राप्त कर लिया था. राजा बलि में देवताओं से अधिक शक्तिशाली था इसलिए सभी देवतागण भयभीत थे. इससे मुक्ति पाने के लिए सभी देवतागण श्रीहरि के पास गए. तभी श्रीहरि ने वामन अवतार लिया.

    विष्णु भक्त, दानवीर राजा बलि विरोजन नामक साम्राज्य के राजा थे. गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी. वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया. उसने अपनी भक्ति के बल पर विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया. लक्ष्मी जी इससे चिंतित हो गई। नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बांधकर उसे अपना भाई बना लिया. उपहार के रूप में वे विष्णु जी को अपने साथ ले आई. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी. 


    कथा-5 ( रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ )

    इतिहासकार एक संबंधित घटना यह भी बताते हैं कि मेवाड़ की रानी कर्णावती के पति की मृत्यु के बाद, उनके राज्य पर गुजरात के शासक बहादुर शाह ने हमला किया था. ऐसा कहा जाता है कि रानी कर्णावती ने बहादुर शाह से मदद लेने के लिए मुग़ल शासक हुमायूँ को राखी भेजी थी.

    हुमायूँ ने राखी स्वीकार की और मेवाड़ की ओर कूच किया, लेकिन वह समय पर वहाँ पहुँचने में असफल रहा. इस कारण रानी कर्णावती ने किले की अन्य महिलाओं के साथ बहादुर शाह से युद्ध किया. हुमायूँ वहाँ पहुँचकर बहुत दुखी हुआ. उसने बहादुर शाह को हराया और रानी कर्णावती के पुत्र को मेवाड़ का शासक बनाया. कहा जाता है कि राखी बांधने की यह परंपरा उसी समय से शुरू हुई थी.


    कथा - 6 

    इतिहासकार कहते है कि हमेशा विजयी रहने वाला अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरु की शक्ति से बहुत विचलित था। इससे सिकंदर की पत्नी बहुत तनाव में आ गई.

    उन्होंने रक्षाबंधन के त्योहार के बारे में सुना था. इसलिए, उन्होंने भारतीय राजा पुरु को राखी भेजी. तब तक युद्ध की स्थिति समाप्त हो चुकी थी. क्योंकि भारतीय राजा पुरु ने सिकंदर की पत्नी को बहन के रूप में स्वीकार किया था.
     
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